बकने को कोई भी कुछ बक सकता है। लेकिन जिन तथाकथित विशेषज्ञों या एक्सपर्ट्स को आप हर दिन बिजनेस चैनलों पर देखते है कि वे भी गारंटी नहीं दे सकते कि आगे शेयर बाज़ार का क्या हाल होगा। रूस-यूक्रेन का युद्ध तो तात्कालिक मामला है। इससे पहले भी अमेरिका समेत सारी दुनिया में बढ़ती मुद्रास्फीति और उसे समतल करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने की तलवार लटकी हुई थी। यह काम इसी मार्च महीने में होना है।औरऔर भी

बाज़ार में इस समय इतनी उथल-पुथल चल रही है कि किसी भी स्टॉक के भाव का अनुमान लगाना लगभग असंभव है। लम्बे समय से दबा चला आ रहा किसी अच्छी कंपनी का शेयर अचानक 5-6% उछलता है तो लगता है कि अब इसने तेज़ी की राह पकड़ ली। लेकिन अगले ही दिन उसके पुराने निवेशक मुनाफावसूली कर डालते हैं तो शेयर फिर धड़ाम हो जाता है। ट्रेडरों का रवैया बेहद छोटा हो गया है। वे मुनाफे काऔरऔर भी

बाज़ार गिर रहा है। गिरता ही जा रहा है। कहा जा सकता कि या तो यह करेक्शन है या तेज़ी के दौर का अंत और मंदी की शुरुआत। अगर करेक्शन है तो फिलहाल समझदारी इसी में है कि बाज़ार का तमाशा दूर खड़े रहकर बाहर से देखा जाए। नहीं तो अगर रिस्क लेने की भरपूर क्षमता हो, तरीका पता हो तो बाज़ार को शॉर्ट किया जाए, डेरिवेटिव सेगमेंट में शॉर्ट सेलिंग की जाए। हम सभी इंसान हैंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार अभी जिस तरह थोड़ा-थोड़ा गिर रहा है, उसे करेक्शन कहते हैं। 24 फरवरी को यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद छह ट्रेडिंग सत्रों में निफ्टी-50 सूचकांक 4.79% गिर चुका है। हो सकता है कि अगले कुछ हफ्तों में 10-12% गिर जाए। करेक्शन के ऐसे दौर में निवेशक घबरा जाते हैं। वे अपनी सारी योजना छोड़ मैदान से भागने लगते हैं। कुछ बाज़ार की सवारी करने का दम भरते हैं और उससे आगे निकलने कीऔरऔर भी

अनिश्चितता में फंसा शेयर बाज़ार गिर रहा होता है तब तलहटी और उभार की भविष्यवाणी करना बड़ा आसान लगता है। लेकिन इतने सारे अनजान कारक सक्रिय होते हैं कि कोई भविष्यवाणी काम नहीं करती। ऐसे में सतर्क रहते हुए सक्रियता घटाने के विकल्प पर गौर करना चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि बाज़ार में हमेशा ऐसे ट्रेडर मिल जाते हैं जो अनिश्चितता की थाह लेने और उससे पार पाने में कहीं ज्यादा सुलझे होते हैं। बाज़ार मेंऔरऔर भी