क्रिप्टो करेंसी में इस्तेमाल होनेवाली ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी बड़े काम की है। कई नामी कंपनियों समेत हमारा कॉरपोरेट क्षेत्र इसे पिछले कुछ साल से अपना भी चुका है। लेकिन रिजर्व बैंक से लेकर सेबी व भारत सरकार तक जैसी ढिलाही बरत रहे हैं, उसमें आम लोगों के बीच क्रिप्टो करेंसी का धंधा मल्टी-लेवल मार्केटिंग स्कीमों जैसे व्यापक फ्रॉड की शक्ल लेता जा रहा है। जगह-जगह कुकुरमुत्तों की तरह फर्जी क्रिप्टो एक्सचेंज बनते जा रहे है। हज़ारों गुना रिटर्नऔरऔर भी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कर दिया है कि केंद्र सरकार बिटकॉयन जैसी किसी भी क्रिप्टो या डिजिटल करेंसी के विज्ञापनों पर कोई बंदिश नहीं लगाने जा रही। ज़मीनी स्थिति यह है कि एनडीटीवी जैसा चैनल तक कॉफी एंड क्रिप्टो जैसा प्रायोजित शो चला रहा है। महानगरों पर कारों पर आपको क्रिप्टो से जुड़े विज्ञापन देखने को मिल जाते हैं। माहौल बनाया जा रहा है कि क्रिप्टो पर बैन लगाना गलत होगा। हमारी सरकार ने कहाऔरऔर भी

नए-नए बच्चे बस इतना देख रहे हैं कि एक बिटकॉयन 42 लाख रुपए और 56,000 डॉलर से ज्यादा का है। एक-एक दिन की ट्रेडिंग में लाखों का वारा-न्यारा। वे नहीं समझना चाहते कि कंप्यूटर साइंस व टेक्नोलॉजी के महारथी बिटकॉयन से लेकर दूसरी क्रिप्टो करेंसी की माइनिंग करते हैं। सामान्य लोग यह काम नहीं कर सकते। फिर ये लोग जो मुद्रा पैदा करते हैं, दूसरे उसमें ट्रेड करते हैं। दुनिया भर में प्रचार और विज्ञापन से इनकीऔरऔर भी

दुनिया के वित्तीय बाज़ारों में तेज़ी का उन्माद क्या अब बुलबुला बनकर फूटने की स्थिति में आ गया है? दुनिया के सफलतम निवेशक वॉरेन बफेट के सहयोगी चार्ली मुंगेर का कहना है कि इस वक्त शेयर बाज़ार में करीब दो दशक पहले के डॉटकॉम बूम से भी ज्यादा पागलपन सवार है। यह पागलपन अब स्टॉक्स के बाहर क्रिप्टो तक फैल चुका है, जिसे कुछ लोग अब करेंसी कहने से बचने लगे हैं। मुंगेर का कहना है किऔरऔर भी

लम्बे निवेश के लिए शेयर बाज़ार से कंपनियों को चुनना बड़ी टेढ़ी खीर है। देखना पड़ता है कि कंपनी कर्ज में तो नहीं डूबी, उसके धंधे में बरक्कत की कितनी गुंजाइश है, प्रवर्तकों का मालिकाना कितना है आदि-इत्यादि। लेकिन हम केवल एक मापदंड पर कस लें तो कंपनी चुनना आसान हो जाता है। यह मापदंड है कि वह लगाई गई पूंजी पर कितना रिटर्न (RoCE) कमा रही है। देश में पूंजी की लागत जितनी हो. मतलब वास्तविकऔरऔर भी