बुलबुले के फटने की तमाम आशंकाओं को धता बताते हुए दुनिया के साथ भारतीय शेयर बाज़ार भी इस समय बढ़े चले जा रहा है। बीच-बीच में दम मारने जैसे मामूली करेक्शन आते रहते हैं। लेकिन हम कैश और डेरिवेटिव सेगमेंट में एफआईआई, डीआईआई और प्रॉपराइटरी फर्मों की खरीद-फरोख्त पर ध्यान दें तो उनकी सक्रियता का पैटर्न पिछले एक महीने से बदलता हुआ नज़र आ रहा है। वे काफी सतर्कता बरते रहे हैं, जबकि रिटेल ट्रेडर एकदम बेपरवाहऔरऔर भी

जिस तरह युद्ध में कभी दोनों पक्ष नहीं जीतते, हमेशा एक पक्ष जीतता और दूसरा हारता है, उसी तरह शेयर बाज़ार में हमेशा एक की जीत और दूसरे की हार होती है। इसलिए मैदान में उतरी पैदल सेना को पता होना चाहिए कि उसका मुकाबला किन-किन महारथियों से है। रिटेल ट्रेडर को जानना ज़रूरी है कि उसका मुकाबला तीन प्रमुख संगठित शक्तियों या महारथियों से है। ये हैं विदेशी संस्थागत निवेशक या एफआईआई, देशी निवेशक संस्थाएं याऔरऔर भी

कंपनी का बिजनेस अच्छा चल रहा है या नहीं, इसका बड़ा साफ पैमाना होता है उसका लाभांश देने का ट्रैक रिकॉर्ड। लाभ बढ़ाकर दिखाने में कंपनियां उलटफेर कर सकती हैं। इसलिए इस पर पक्का भरोसा नहीं किया जा सकता है। लेकिन लाभांश देने में वे कलाकारी नहीं कर सकतीं। इससे शेयरधारकों के प्रति कंपनी की संवेदनशीलता और प्रबंधन की प्रतिबद्धता का भी पता चलता है। शेयर बाज़ार दबा हो, कंपनी को कम भाव मिल रहा हो तोऔरऔर भी

आपने ध्यान दिया होगा कि कभी-कभी ढाई बजे के आसपास शेयर बाज़ार का रुख एकदम पलट जाता है। निफ्टी/सेंसेक्स अचानक दिशा बदल लेते हैं। यह बाज़ार में सुनियोजित बिकवाली या खरीद का प्रभाव है। जानकार लोग इसे फैंटम प्रभाव कहते हैं। इसमें ऑपरेटर या बड़े देशी संस्थान चुनिंदा सौदों से चंद मिनट में बाज़ार का रुख बदल देते हैं। वे निफ्टी/सेंसेक्स के शेयरों में से चार-पांच को चुनकर खरीद-बिक्री का ऐसा खेल करते हैं कि व्यापक बाज़ारऔरऔर भी