कोरोना वायरस ने साल भर से हड़कम्प मचा रखा है। लेकिन बहुत हुआ तो वायरस कई म्यूटैंट बनाने के बावजूद साल-दो साल में खत्म हो जाएगा। नाकारा व संवेदनहीन सरकार हुई तो देश में ज्यादा लोग, ज्यादा तकलीफ से मरेंगे और अर्थव्यवस्था को ज्यादा चोट लगेगी। वहीं, अच्छी व संवेदनशील सरकार हुई तो कम लोग कम तकलीफ से मरेंगे और अर्थव्यवस्था को कम चोट पहुंचेगी। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटेगी। अच्छीऔरऔर भी

तय मानकर चलें कि भारतीय शेयर बाज़ार का गुब्बारा किसी देशी घटनाक्रम से नहीं फूटेगा। ग्लोबल हो चुके बाज़ार में इसका स्रोत बाहरी होगा। अंदर तो हमारे समूचे तंत्र की इलास्टिक खींच-खींचकर इतनी ढीली कर दी गई है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ घनघोर भ्रष्टाचार का महाभियोग भी खिसककर नीचे गिए जाएगा। बाहर से बाज़ार को जोर का झटका भयंकर उधारी का तंत्र टूटने पर लग सकता है। इस समय हालत यह है कि एक डॉलर लगाकर 500औरऔर भी

आर्थिक गतिविधियां कोरोना संकट से पहलेवाली स्थिति में कब लौटेंगी, नहीं पाता। हालांकि शेयर बाज़ार अब भी मानकर बैठा है कि सब ठीक होने जा रहा है। सवाल उठता है कि बाज़ार की तेज़ी सस्ते धन के प्रवाह और सटोरिया पूंजी की चहक के दम पर आई है या किसी ठोस आशावाद की बदौलत? ऊपर-ऊपर सब सुनहरा है। कोरोना से निपटने के वैश्विक वित्तीय पैकेज का धन भी भारत, चीन व इंडोनिशिया के बाज़ारों की तरफ बहऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था के उबरने की कोई सूरत नहीं दिख रही। लेकिन शेयर बाज़ार का मूल्यांकन किसी दम्भी राजा के गुमान की तरह फूले जा रहा है। आखिर कब उसका गुमान टूटेगा, गुब्बारा फूटेगा? लॉकडाउन में घर-बैठे लोग साल भर से बाज़ार में कूदते रहे हैं और फिर कूदने को तत्पर हैं। देश 1992 से लेकर 2008 तक हर्षद मेहता व केतन पारिख से लेकर हेजफंड और सब-प्राइम संकट से निकले भूचाल देख चुका है। लेकिन इस बार कबऔरऔर भी