टेक्निकल एनालिसिस में माना जाता है कि शेय़रों में 52 हफ्ते का शिखर प्रतिरोध/रजिस्टेंस का काम करता है और वहां से उसके भाव गिर सकते हैं। लेकिन फिलहाल यह नियम काम नहीं कर रहा। भारत ही नहीं, सारी दुनिया का यही सूरते-हाल है। बहस छिड़ी है कि बाज़ार शक्तियों को अर्थव्यवस्था के कोविड-19 से उबर आने का इतना भरोसा क्यों है? कहीं पलटकर कोरोना ने फिर से कहर बरपाना शुरू कर दिया तो! अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में खरीदार ही खरीदार होने से बुलबुला बनता जा रहा है। बाज़ार से शॉर्ट-सेलर गायब हैं। ऐसे में जब भी बुलबुला फटेगा तो कोई नीचे खरीदकर संभालनेवाला नहीं होगा। नतीज़तन, बाज़ार कभी भी गहरा गोता लगा सकता है। तब, इस मौके का फायदा उठाने के लिए किनारे बैठे शॉर्ट-सेलर बाज़ार में कूदकर अफरातफरी को भुनाने लग जाएंगे और पलक झपकते ही ट्रेडरों और निवेशकों के लाखों करोड़ स्वाहा हो सकते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में वाजिब संतुलन के लिए तेज़ी और मंदी दोनों से कमानेवाले ट्रेडर चाहिए। लेकिन इधर पिछले कई महीनों से मामला एकतरफा हो गया है। बाज़ार से शॉर्ट-सेलर गायब हो गए हैं। उन्होंने जब भी सोचा या किया कि अभी बेचकर बाद में सस्ते में खरीदकर डिलीवरी दे देंगे तो तेजड़ियों के हाथों मुंह की खानी पड़ी और शॉर्ट कवरिंग में भारी घाटा उठाना पड़ा। बाज़ार में खरीदार ही खरीदार छाए हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में अनुमान लगाया है कि चालू वित्त वर्ष 2020-21 में हमारी अर्थव्यवस्था में 7.5% ही गिरावट आएगी, जबकि उसका पिछला अनुमान 9.5% की गिरावट का था। अगर ऐसा होता है कि इसका श्रेय भारतीय अवाम और उद्योग क्षेत्र को जाएगा, सरकार को नहीं। कारण, अब तक सरकार के सारे घोषित पैकेज ज़मीनी धरातल पर नाकाम और महज दिखावा साबित हुए हैं। जहां सरकार को जीडीपी बढ़ाने के लिए अपनाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग तुरत-फुरत का खेल है। ज्यादातर ट्रेडर इंट्रा-डे सौदे निपटाते हैं। संस्थाएं इंट्रा-डे ट्रेडिंग में हैं नहीं तो समूचा मैदान व्यक्तिगत ट्रेडरों के लिए खुला है। स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेडिंग की मीयाद भी कुछ दिन से लेकर अधिक से अधिक एकाध महीने होती है। ट्रेडर अपनी पूंजी इससे ज्यादा नहीं फंसाता। इसलिए न्यूनतम रिस्क में अधिकतम कमाई की सोचवाले ट्रेडर हमेशा बढ़ते शेयरों पर दांव लगाकर कमाते रहे हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

निफ्टी व सेंसेक्स ही नहीं, उनमें शामिल आधी से ज्यादा कंपनियां या तो ऐतिहासिक शिखर पर हैं या उससे 5-10% फासले पर। अन्य सूचकांकों में शामिल कंपनियों का भी यही हाल है। केवल सरकारी कंपनियां ही इसका अपवाद हैं। लेकिन उनको लेकर सेंटीमेंट अक्सर इतना डूबा रहता है कि लगता है कि उनमें हाथ लगाया तो ट्रेडिंग का दांव मजबूरन लंबे निवेश में बदलना पड़ेगा। ऐसे में ट्रेड करें तो किन स्टॉक्स में? अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी