यह उधार की दुनिया है। बेहद सस्ता उधार लेकर ग्लोबल पूंजी मुनाफे के माध्मय तलाशती हर तरफ सूंघती फिर रही है। व्यापार और पूंजी के प्रवाह में असंतुलन आ गया है। अर्थव्यवस्था का वित्तीयकरण हो चुका है। कोई सवाल नहीं उठते क्योंकि इससे सम्पन्नता व समृद्धि आ रही है। लेकिन वित्तीय पूंजी का यह दबदबा कितना घातक है, यह 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट दिखा चुका है। तभी से लीपापोती चल रही है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

प्राइस डिस्कवरी में शेयर बाज़ार की भूमिका किसी एक कंपनी या उद्यम के बारे में सही हो सकती है। मसलन, रिलायंस ने कोरोना संकट के बावजूद जियो प्लेटफॉर्म के लिए 1.52 लाख करोड़ रुपए जुटा डाले। लेकिन शेयर बाज़ार अर्थव्यवस्था का मूल्य खोजने का साधन नहीं रह गया है। कारण यह है कि बोली लगानेवाला धन अब देशी ही नहीं रहा, बल्कि इसमें कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका विदेशी धन की हो गई है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अमेरिका के बारे में कह सकते हैं कि वहां 3 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। वहां सालों-साल का इतिहास रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव आने तक शेयर बाज़ार को चढ़ाया जाता है। इसलिए शेयर बाज़ार को ज्यादा भाव मिल रहा है। लेकिन जापान के निक्केई सूचकांक का पी/ई अनुपात क्यों चढ़ा हुआ है? वहीं, चीन का शांघाई सूचकांक दबा हुआ है, जबकि वह कोरोना पर काफी हद तक नियंत्रण कर चुका है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

कहते हैं कि शेयर बाज़ार उद्यमों का मूल्य खोजने या प्राइस डिस्कवरी का माध्यम हैं। अर्थव्यवस्था की अंदरूनी क्षमता भी यह दिखाता है। पर यह वाकई कैसे होता है, यह कतई साफ नहीं। जैसे, अमेरिका का डाउ जोन्स सूचकांक व S&P-500 सूचकांक का पी/ई अनुपात साल भर में बढ़कर क्रमशः 18.60 से 28.26 और 21.92 से 35.39 हो गया, जबकि वहां की आर्थिक स्थिति खराब चल रही है और भविष्य भी डांवाडोल है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

भारत ने कोरोना के नए मामलों में दुनिया के तमाम देशों को पीछे छोड़ दिया है। पिछले 24 घंटे में यहां 63,489 नए मामले आए हैं। हालांकि अमेरिका समेत अन्य बड़े देशों में कोरोना का कहर फिलहाल उतार पर है। वैसे भी कोरोना रहे या जाए, कुछ ऐसे बिजनेस और कंपनियां हैं जो आर्थिक जीवन के लिए अपरिहार्य हैं। कंपनी सरकारी हो या निजी, इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। आज तथास्तु में ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी