ट्रेन की पटरियां अमूमन दशकों तक वही की वही रहती हैं। लेकिन शेयर अपने स्वभाव से बंधे होने के बावजूद ट्रैक बदलते रहते हैं तो हम शेयरों की गति पुरानी जानकारी के आधार पर यांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि उसे प्रभावित करनेवाले कारकों को गणना में अच्छी तरह शामिल करके पता लगा सकते हैं। मगर भावनाओं, धन के प्रवाह और अर्थव्यवस्था व उद्योग की स्थिति जैसे कारक सारा कुछ जटिल बना देते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

आप ट्रेन में बैठे हैं। चलते जाना उसका स्वभाव है। स्टेशनों पर रुकते-रुकाते वह बराबर चली जा रही है। कोई आपसे पूछे कि अगला स्टेशन कौन-सा आएगा, आप सहजता से बता देंगे। इसी तरह अगर आपको किसी खास शेयर का स्वभाव पता है, ट्रैक-रिकॉर्ड मालूम है जिस पर वह बराबर चलता रहा है तो आप सहजता और काफी सटीकता से बता सकते हैं कि उसका अगला पड़ाव या मोड़ क्या हो सकता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

वैज्ञानिक सच्चाई यह है कि धरती व सृष्टि से लेकर हमारे शरीर तक में हर पल असंख्य क्रिया-प्रतिक्रिया चलती रहती है। यह सतत परिवर्तन ही जीवन का सबब है। यह रुक जाए तो जीवन खत्म हो जाता है। लेकिन अज्ञान/अविद्या के चलते हमारे मन में यह धारणा बैठी रहती है कि सब कुछ स्थिर, शाश्वत है। अविद्या को मिटाकर हम यह धारणा तोड़ दें तो शेयरों की सही गति का भान संभव है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाने के सूत्र के पीछे एकमात्र सोच यही है कि वहां सब कुछ पल-पल बदल रहा है। वित्तीय बाज़ार आज ग्लोबल हो चुका है। हमारा बाज़ार बंद रहे, तब भी बदलाव का चक्र चौबीसों घंटे अनवरत चलता रहता है। लेकिन बदलाव की यह सोच समग्र व संपूर्ण तभी बनती है जब इसे बाकी जीवन में भी देख-समझ व महसूस किया जाए। दो नांवों की सवारी घातक होती है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयरों की एक लागत निवेशक धन से अदा करता है। दूसरी लागत भावनाओं से चुकाता है। बाज़ार टूटता है तो उसका कलेजा निकल जाता है। खासकर तब, बड़ी समझ व उम्मीद से खरीदे शेयर अचानक दो कौड़ी के हो जाते हैं, पेन्नी स्टॉक्स। मूलधन भी नहीं निकलता। जो बढ़ते हैं, उन्हें लंबा निवेश मानकर वह बस देखता है, बेचता नहीं। इसीलिए कहते हैं पहले कंपनी को परखो, तब शेयर को देखो। अब तथास्तु में आज की कंपनी….औरऔर भी