अर्थव्यवस्था की लटें शिव की जटाओं की तरह उलझी हुई हैं। एक लट खुलते ही गंगा बह निकलती है। अर्थव्यवस्था की लटें भी जितनी अच्छी तरह खोली जाएं, देश में विकास की गंगा उतनी ही बेधड़क बहने लगती है। हर साल बजट इन्हीं लटों को खोलने का काम करता है। देखना यह है कि पांच साल के कदमताल के बाद मोदी सरकार नए कार्यकाल के पहले बजट में क्या करती है। तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

जब देश की 55 प्रतिशत खेती मानसून के भरोसे हो तो किसान आसमान ही नहीं, सरकार की तरफ भी बड़ी उम्मीद से देखता है। इस बार अभी तक मानसून की बारिश औसत से काफी कम रही है तो सरकार से उम्मीदें कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। वैसे भी पांच साल कदमताल करने के बाद पहले से ज्यादा प्रचंड बहुमत से दोबारा सत्ता में आई सरकार से किसान ही नहीं, सारा देश बेहद ठोस कामों की अपेक्षाऔरऔर भी

मुश्किल यह है कि शेयर बाज़ार में लाख पारदर्शिता के बावजूद हम देख नहीं सकते कि हमारे सौदे के सामने कौन है। हम खरीद रहे तो कौन बेच रहा है और हम बेच रहे हैं तो खरीद कौन रहा है। लेकिन दैनिक व साप्ताहिक चार्ट पर भावों का पैटर्न देखकर सोचा-समझा अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऐसे पैटर्न की समझ हमें न्यूनतम रिस्क में जीत की अधिकतम संभावनावाले सौदे पकड़ना सिखा सकती है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सौदा करने से पहले सबसे ज़रूरी बात है यह समझना कि हम खरीद रहे हैं तो सामने से बेच कौन रहा है। लगे कि संस्थाएं या प्रोफेशनल ट्रेडर सामने से बेच रहे हैं तो फौरन सौदे से हाथ खींच लेना चाहिए क्योंकि तब हमारा दांव उल्टा पड़ने की आशंका बहुत ज्यादा नहीं, शत-प्रतिशत है। वहीं, अगर रिटेल ट्रेडर हमारा सौदा पूरा कर रहा है तो समझिए कि सफलता की संभावना बहुत ज्यादा है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

परम्परागत सोच से बाहर निकलने का सीधा-सरल तरीका यह है कि हम भावों के चार्ट को परखकर समझें कि डिमांड-सप्लाई का नियम क्या कह रहा है। अगर लगे कि उस वक्त के भाव पर बैंक, वित्तीय संस्थाएं व प्रोफेशनल निवेशक खरीद कर सकते हैं तो हमें भी खरीद का फैसला लेना चाहिए। वहीं, अगर शेयर सप्लाई ज़ोन में हो और संस्थागत निवेशक बेचकर मुनाफा कमाने की स्थिति में नजर आएं तो बेचना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी