बाज़ार में बढ़ने और गिरने के असंतुलित व विपरीत स्वभाव को देखते हुए संकट का पहला संकेत मिलते ही जितना मिल रहा हो, उतने पर बेचकर निकल लेना चाहिए। संस्कृत में एक कहावत है कि सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पंडितः अर्थात सम्पूर्ण का नाश होते देखकर आधे को बचा लें और आधे का त्याग कर दें। हमेशा यह सच स्वीकार करके चलें कि निवेश व ट्रेडिंग निश्चितताओं का नहीं, प्रायिकताओं का खेल है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में मंदी के दौर का स्वभाव तेज़ी के दौर से एकदम उलटा होता है। मंदी में बाज़ार धीरे-धीरे नहीं, एकबारगी गिरता है। अक्सर होता यह है कि एक-दो साल में बाजार या कोई स्टॉक जितना बढ़ा होता है, वह सारी की सारी बढ़त चंद दिनों में स्वाहा हो जाती है। बहुत सारे स्टॉक्स धारदार चाकू की तरह गिरते हैं, जिन्हें पकड़ने की कोशिश में घाव और गहरे होते चले जाते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार जिस तरह से काम करता है, उसमें भावों का बढ़ना धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से होता है। असल में तेज़ी का बाज़ार हमेशा धीरे-धीरे करके बनता है, एकबारगी नहीं। वह एक-एक कदम, एक-एक सीढ़ी चढ़ता है। इसकी सीधी-सी वजह है कि भरोसे को बनने और बढ़ने में वक्त लगता है। इसलिए तेज़ी के बाज़ार में मौके हाथ से खटाक से नहीं निकल जाते। चूक जाने पर उन्हें दोबारा पकड़ा जा सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हर दिन सैकड़ों स्टॉक्स 52 हफ्ते की नई तलहटी पकड़ रहे हैं। शुक्रवार को ही एनएसई में 293 स्टॉक्स ने तलहटी पकड़ ली। छोटी कंपनियों की हालत ज्यादा ही खस्ता है। बीएसई स्मॉलकैप सूचकांक जनवरी 2018 के शिखर से 35% से ज्यादा गिर चुका है। एक अध्ययन के मुताबिक 2010 के बाद से जो 228 स्टॉक्स 75% से ज्यादा गिरे हैं, उनमें से केवल आठ पुरानी ऊंचाई पर लौट सके। निराशा के बीच आशा जगाती एक कंपनी…औरऔर भी

भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का सारा मंसूबा इस पर टिका है कि देश में भरपूर विदेशी निवेश आएगा। शेयरों के साथ उद्योग में भी। पर बिजनेस करने की आसानी के दावों के बावजूद विदेशी निवेशकों को चीन, वियतनाम या थाईलैंड ज्यादा रास आते हैं। कारण स्पष्ट है। विश्व व्यापार में हमारा हिस्सा 2% से कम है जबकि हमारे यहां ट्रांसफर-प्राइसिंग विवाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी