सूचकांक के घटकों में बदलाव के लिए बाज़ार पूंजीकरण से लेकर लिक्विडिटी जैसे तमाम मानक बनाए गए हैं। लेकिन हम स्टॉक्स को निकालने या लाने की रणनीति को गहराई से परखें तो स्पष्ट हो जाता है कि निर्धारित मानकों पर ठीक से अमल नहीं किया जाता। अमूमन सूचकांक में ऐसे स्टॉक्स लाए जाते हैं जो पहले से ही काफी चढ़ चुके होते हैं और उनमें ज्यादा बढ़ने की गुंजाइश बहुत कम होती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

सेंसेक्स व निफ्टी भले ही बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र को तवज्जो देते हों, लेकिन उनके घटक स्टॉक्स को बराबर बदला जाता है। इसके लिए हर छह महीने पर जनवरी व जुलाई में समीक्षा की जाती है। किन स्टॉक्स को निकालना और किनको लाना है, इसका औपचारिक नोटिस चार हफ्ते पहले दे दिया जाता हैं और अमल मार्च व सितंबर के डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी के बाद के पहले कामकाजी दिन किया जाता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

काश! कुछ ऐसा मिल जाता है जिसमें पक्की कमाई हो जाती। उसने तो इतना बना लिया और मैं पीछे छूट गया। जितना मिला ठीक, पर और ज्यादा मिले। कहीं मौका हाथ से निकल न जाए। निवेशकों के मन में ऐसे विचार अमूमन आते हैं। इन सब का असर बाज़ार पर भी पड़ता है। लेकिन निजी स्तर पर इसका खामियाज़ा हम एक बार नहीं, बार-बार गलतियों के रूप में भुगतते हैं। अब तथास्तु में आज की उभरती कंपनी…औरऔर भी

जिन्हें निफ्टी के फ्यूचर्स व ऑप्शंस में ट्रेड करना है, उनकी बात अलग है। लेकिन जिन्हें समूचे बाज़ार में ट्रेड करना है, उन्हें बाज़ार की नब्ज़ को सही ढंग से समझने के लिए बीएसई-500 और एनएसई-500 पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही जिस क्षेत्र की कंपनी चुनी हो, उसके सूचकांक की दशा-दिशा भी देख लेनी चाहिए। वैसे भी आम ट्रेडर लार्जकैप से कहीं ज्यादा तवज्जो स्मॉल व मिडकैप को देता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सेंसेक्स व निफ्टी के स्वरूप को देखने से साफ हो जाता है कि हम जिन सूचकांकों को अर्थव्यवस्था व सारे शेयर बाज़ार का प्रतिनिधि मानते हैं, वे असल में बैंकिंग व फाइनेंस की ज्यादा नुमाइंदगी करते हैं, अन्य आर्थिक क्षेत्रों की काफी कम। हालांकि कह सकते हैं कि हमारे डीजीपी में सर्वाधिक लगभग 60% योगदान सेवा क्षेत्र का है तो उसमें प्रमुख होने के नाते बैंकिंग व फाइनेंस को तवज्जो देना वाजिब है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी