अतीत के रिटर्न और प्रदर्शन से कतई गारंटी नहीं होती कि कंपनी भविष्य में भी वैसी ही उपलब्धि हासिल कर लेगी। शेयर बाज़ार में निवेश का यह प्रमुख रिस्क है। लेकिन अगर अच्छी तरह परख लें कि कंपनी प्रबंधन ने प्रतिकूल हालात से कैसे निपटा और वह आज की ज़मीन पर मजबूती से डटकर कल को साधने की कला में कितना सिद्धहस्त है तो यह काफी रिस्क घट जाता है। तथास्तु में आज ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

शेयरों के भाव कंपनी के फंडामेंटल्स नहीं, बल्कि उसके फंडामेंटल्स के प्रति लोगों के नज़रिए के आधार पर बदलते हैं। वहीं, शेयर के भावों में कंपनी के प्रति लोगों का नजरिया झलकता है। अगर सकारात्मक नज़रिया है तो वे उसे खरीदते हैं। इस तरह बहुत सारे लोगों के खरीदने से स्टॉक के भाव चढ़ते जाते हैं। नकारात्मक नज़रिया है तो लोगबाग स्टॉक को बेचने लगते हैं तो उसके भाव गिरते चले जाते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कंपनी के फंडामेंटल मजबूत हुए तो सूचकांक से निकलने के बाद स्टॉक जल्दी ही पलटकर बढ़ने लगता है। मसलन, जून 2015 से जून 2017 के बीच सेंसेक्स से टाटा पावर, वेदांता, हिंडाल्को, भेल और गैल इंडिया को निकाला गया था। तब से इनके शेयरों के भाव क्रमशः 22%, 266%, 225%, 11% और 32% बढ़ चुके हैं। वहीं, सूचकांकों में शामिल किए गए स्टॉक्स के भाव ट्रेडरों की दिलचस्पी बढ़ने से चढ़ने लगते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

आमतौर पर शेयर बाज़ार के प्रमुख सूचकांकों से ऐसे स्टॉक्स को बाहर किया जाता है जो काफी गिर चुके हैं, इतने ज्यादा कि उनमें और ज्यादा गिरने की गुंजाइश काफी कम होती है। होता यह है कि सूचकांक से निकाले जाने के बाद ऐसे स्टॉक्स सदमे में तात्कालिक रूप से गिर जाते हैं क्योंकि सूचकांक से जुड़े ईटीएफ और म्यूचुअल फंडों को एडजस्ट करने के लिए उन्हें बेचकर नए स्टॉक्स खरीदने होते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी