सवाल यह है कि निवेश या ट्रेडिंग से जुड़े रिस्क की गणना कैसे करें? पहली बात यह कि यह रिस्क लॉटरी या पोकर खेलने से एकदम भिन्न है। यहां बिजनेस में लगी एक कंपनी है जिसके शेयर का भाव अंततः उसके धंधे की सेहत से निर्धारित होता है। वो अपने अंतर्निहित मूल्य से निश्चित रेंज में ऊपर-नीचे होता है। इसे उसकी चंचलता या वोलैटिलिटी कहते हैं जिसे स्टैंडर्ड डेविएशन से नापा जाता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग करते वक्त हमें अनिश्चितता के तत्व को बराबर याद रखना चाहिए। इसलिए इसमें वही धन लगाना चाहिए जो डूब भी जाए तो हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी पर कोई असर न पड़े। शायद यही समझ है जिसकी वजह से मध्यवर्ग के आम लोग शेयर बाज़ार से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। लेकिन दिमाग का सही इस्तेमाल करें तो सुविचारित रिस्क लेने में कोई हर्ज नहीं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अनिश्चितता एक तरह की आकस्मिकता है, रोकना तो दूर, जिसका पहले से पता लगा पाना भी संभव नहीं है। इसके हमले से बचने के लिए आज बीमा ही एक सहारा है जिसकी बाकायदा कीमत चुकानी पड़ती है हर साल प्रीमियम के रूप में। वित्तीय बाज़ार में बड़े निवेशक डेरिवेटिव सौदों का सहारा लेकर कैश सेगमेट के सौदों को अनिश्चितता की मार से बचाते हैं। लेकिन छोटे निवेशकों के पास ऐसा कवच नहीं है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

दुनिया हर दिन छोटी होती जा रही है। कभी चीन, कभी जापान तो कभी यूरोप व अमेरिका की आर्थिक राजनीतिक हलचल भारत जैसे बाज़ारों को प्रभावित करती रहती है। ग्लोबीकरण ने कम से कम सभी देशों के वित्तीय बाज़ारों को एक तार में बांध दिया है। किसी एक देश की अनिश्चितता से अन्य देशों की अनिश्चितता नत्थी हो गई है। इसे हम रोक तो नहीं सकते। लेकिन इसके रिस्क को बांध सकते हैं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

नोटबंदी ने देश के 25 करोड़ से ज्यादा परिवारों ही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था तक की रीढ़ हिला दी है। अपने यहां काम-धंधे का अनौपचारिक क्षेत्र है जो फैक्टरी, खनन, कंपनी या दुकानों से जुड़े कानूनों में पंजीकृत नहीं है। इसका देश के कुल उत्पादन में 48% और रोज़गार में 80% हिस्सा है। इसे तगड़ा झटका लगा है। संगठित क्षेत्र की छोटी कंपनियां भी परेशान हैं। हालांकि उनका आधार बड़ा मजबूत है। तथास्तु में ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी