वाकई, शेयरों के भाव हाइज़ेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत की तरह बर्ताव करते हैं। इसके मुताबिक, आप किसी अणु की एकदम सटीक स्थिति नहीं माप सकते क्योंकि जिस भी यंत्र या माध्यम से आप उसे नापते हैं, उसका कर्षण बल नापने की प्रक्रिया में उस अणु की स्थिति ही बदल देता है। हाथ लगाओ, डर जाएगी; बाहर निकालो, मर जाएगी। भाव किसी के स्थिर दिमाग में नहीं, बाज़ार के प्रवाह में तय होते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार शायद इकलौती जगह है जहां माल के भाव दिनों में नहीं, मिनटों में बदल जाते हैं। दिखते हैं कि भाव तय हैं। मगर, जैसे ही आप खरीदने चलते हो, वो मछली की तरह हाथ से सरक जाते हैं। फुटकर खरीदने या बेचनेवालों से खास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जब बैंक या संस्थाएं करोड़ों के सौदे करती है तो उनके खरीदते-खरीदते ही भाव उछल जाते हैं। खासकर स्मॉल-कैप या मिडकैप स्टॉक्स। अब आजमाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

खबरों का असर यकीनन वित्तीय बाज़ार, खासकर शेयर बाज़ार पर पड़ता है। लेकिन किसी खास खबर का कैसा असर पड़ेगा, इसे पक्के तौर पर पहले से नहीं कहा जा सकता। शनिवार ही था, जब रघुराम राजन को रिजर्व बैंक में एक्सटेंशन न मिलने की बुरी खबर आई थी तो सोमवार को बाजार अविचलित रहा। इस बार शनिवार को उर्जित पटेल को नया गवर्नर बनाने की अच्छी खबर आई, तब भी बाज़ार ठंडा रहा। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

सहज-सी बात है कि लोगबाग जब बाज़ार में मौका देखते हैं, तभी अपना धन दांव पर लगाते हैं। गलती हो जाए तो इसका खामियाज़ा खुद भुगतते हैं और अपना दांव सुधार लेते हैं। इस तरह बराबर सीखते और खुद को दुरुस्त करते रहते हैं। लेकिन कुछ लोग चंद सौदों पर सारी ट्रेडिंग पूंजी लगा देते हैं और सीखने-समझने का आधार ही गंवा देते हैं। इस तरह के लोगों को कोई नहीं बचा सकता। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बचत व निवेश हम इसीलिए करते हैं ताकि संकट के समय सांसत में न फंस सकें। लेकिन संकट के समय में दो सबसे ज्यादा काम आनेवाली चीजें हैं कैश व साहस। साहस हमारे स्वभाव का हिस्सा है जो प्रतिकूलता से  जूझते हुए स्वाभाविक रूप से आकार लेता है। लेकिन कैश हमें बराबर संभालकर रखना पड़ता है और अधिकांश  निवेश ऐसे माध्यमों में करना चाहिए जिसे हम फौरन कैश में बदल सकें। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी