सीमा को समझें, ताकत को पहचानें
हम हाई-फ्रीक्वेंसी या अल्गोरिदम ट्रेडिंग से आक्रांत रहते हैं। भूल जाते हैं कि उन्नत से उन्नत सॉफ्टवेयर भी इंसान को मात नहीं दे सकता। हम आक्रांत रहते हैं कि संस्थाएं और एचएनआई करोड़ों में खेलते हैं, जबकि हम उनके सामने पिद्दी भी नहीं हैं। लेकिन हर कमज़ोरी में कोई न कोई ताकत छिपी होती है। जिस तरह हाथी को मुड़ने में वक्त लगता है, वैसे ही संस्थाएं छोटे सौदों से नहीं कमा पातीं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी
ऑप्शंस खरीदने नहीं, बेचने में फायदा
पूंजी, दरअसल हमारी बड़ी सीमा है। हम ऑप्शंस खरीदते हैं क्योंकि उसमें कम पूंजी लगती है। लेकिन हकीकत यह है कि ऑप्शंस खरीदना अक्सर घाटे का सौदा होता है। रिसर्च से पता चला है कि ऑप्शंस के दाम अमूमन औकात से ज्यादा चढ़े होते हैं। इसलिए फायदा उन्हें बेचने या राइट करने में है, न कि खरीदने में। लेकिन ऑप्शंस बेचने के लिए कम से कम 5 लाख रुपए की पूंजी होनी चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी
अवसर बहुतेरे, पर पूंजी तो सीमित है
कोई शेयर चंद दिनों में 20-25% बढ़ जाए या हमने जिसे बेचा वो उसके बाद भी जमकर चढ़ जाए तो हमारा दिल मसोस कर रह जाता है। वास्तविकता यह है कि बाज़ार हर कारोबारी दिन खुलता है और ट्रेडिंग के सैकड़ों अच्छे अवसर फेंकता है। लेकिन बाज़ार के सारे अवसर हमारे नहीं हो सकते क्योंकि हमारी पूंजी और दायरा सीमित है। अपनी सीमा को समझकर आगे देखें, पीछे देखना निरर्थक है। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी
ट्रेडिंग का मकसद साफ होना चाहिए
वित्तीय बाज़ार में सबका मसकद अलग-अलग होता है। एनालिस्ट का मकसद भौकाल बनाना है ताकि वो अपना और अपनी फर्म का फायदा करा सके। हमारा फायदा उसका मकसद नहीं है। ब्रोकर का मकसद हमसे ज्यादा से ज्यादा ट्रेड कराना होता है ताकि उसे जमकर ब्रोकरेज मिल सके। हमें भी साफ होना चाहिए कि हम ट्रेडिंग क्यों कर रहे हैं क्योंकि हम इतने रईस नहीं हैं कि इतना महंगा शौक पाल सकें। अब पकड़ते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी






