बिरले लोग ही होते हैं जो भयंकर रिस्क उठाना चाहते हैं। अन्यथा ज्यादातर निवेशक या ट्रेडर न्य़ूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न कमाना चाहते हैं। जीवन, स्वास्थ्य या संपत्ति के रिस्क को संभालने के लिए बीमा है। पर, वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग के रिस्क को संभालने के क्या उपाय हैं? एक आम तरीका तो लोग यह अपनाते हैं कि किसी से टिप्स ले ली जाए। लेकिन टिप्स लेना शत-प्रतिशत घाटे सौदा साबित होता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जो पल गुज़र चुका, उसको लेकर बहुत सारी चीजें ऐलानिया कही जा सकती हैं। लेकिन जो पल आनेवाला है, वो अनिश्चितता से घिरा है जिसे मिटाया नहीं जा सकता। बाकायदा कीमत अदा करके उसे नाथा तो जा सकता है और इसी पर सारा बीमा व्यवसाय टिका है। लेकिन अनहोनी के रिस्क को खत्म नहीं किया जा सकता। शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग के रिस्क को भी कभी खत्म नहीं किया जा सकता। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

पोर्टफोलियो प्रबंधन का सिद्धांत कहता है कि अगर अगल-अलग तरह की 40 कंपनियों में निवेश किया जाए तो पूरे निवेश में कंपनियों का खास अपना रिस्क मिट जाता है और केवल शेयर बाज़ार का आम रिस्क बचा रह जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आम निवेशकों को एक समय में कितनी कंपनियों में निवेश रखना चाहिए। व्यवहार कहता है कि इनकी संख्या 15 से 40 रहे तो बेहतर है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

डेरिवेटिव सौदे शेयरों की असली चाल की ही छाया हैं। इसलिए उनमें सट्टेबाज़ी का तत्व भी ज्यादा है। हमारी सरकार को यह तत्व घटाने की कोशिश करनी चाहिए, न कि बढ़ाने की। वर्तमान स्थिति ऐसी नहीं है। जैसे, आम नियम यह है कि सटोरिया सौदे से हुए नुकसान को सटोरिया सौदे से ही हुए मुनाफे से बराबर किया जा सकता है। लेकिन शेयर बाज़ार के डेरिवेटिव्स सौदे इस नियम से एकदम मुक्त हैं। अब शुक्र का अभ्सास…औरऔर भी

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने जून 2013 में एक विशेषज्ञ दल बनाया था जिसने अपनी रिपोर्ट सितंबर के पहले हफ्ते में ही सरकार को सौंपी है। इसमें उसने कहा कि वित्तीय सेवाओं में ट्रेडिंग के लिए भारत आकर्षक ठिकाना नहीं है। इसलिए यहां शेयरों के डेरिवेटिव सौदों पर लग रहा 0.01% एसटीटी भी खत्म कर देना चाहिए ताकि विदेशी निवेशकों को ज्यादा खींचा जा सके। आप सोचें कि ऐसा करना कहां तक सही होगा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी