हम वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग को इसीलिए चुनते हैं ताकि किसी बॉस की किटकिट न रहे। हम मालिक हों अपनी मर्जी के। आज़ाद हों। जब मन चाहे काम करें, न चाहे तो मौज करें। लेकिन यहां पहुंचते ही हम भावनाओं के गुलाम बन जाते हैं। फिर बाज़ार ऐसा धोबियापाट मारता है कि हम उठने-बैठने के काबिल तक नहीं रह जाते। अरे भाई, कमाने के लिए रोज़ाना ट्रेडिंग ज़रूरी तो नहीं! आइए, अब आखिरी दिन शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सरकारें अक्सर घबरा जाती हैं कि शेयर बाज़ार कहीं ज्यादा न गिर जाए। अपने यहां भी मोदी सरकार बाज़ार गिरते ही फौरन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को पटाने में लग जाती है। हालांकि विदेशी निवेशक ज्यादा पाने की फिराक में लगे रहते हैं और बाज़ार का खेल जारी रहता है। वैसे भी, जानकार कहते हैं कि जब चीन जैसी मजबूत सरकार शेयर बाजार को नहीं संभाल पा रही है तो भारत की क्या बिसात! अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अजीब अंधेरगर्दी है वित्तीय बाज़ार के विद्वानों व विश्लेषकों की। एक तरफ कहते हैं कि रिजर्व बैंक को ब्याज दरें घटा देनी चाहिए ताकि बैंक उद्योग को कम ब्याज पर ऋण दे सकें और आर्थिक विकास तेज़ हों। वहीं, जब एचडीएफसी बैंक ने आधारभूत ब्याज दर 9.70 से घटाकर 9.35% कर दी तो कहने लगे कि इससे दूसरे बैंक भी ऐसा करने को मजबूर हो जाएंगे तो बैंकिंग उद्योग का मार्जिन घट जाएगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

मूल्य खोज का अंतिम फायदा कंपनियों को होता है। इसलिए वे चाहती हैं कि शेयर बाज़ार में सक्रियता बनी रहे। वे मीडिया पर विज्ञापन से लेकर स्टॉक एक्सचेंजों को लिस्टिंग फीस वगैरह देती हैं। बाज़ार में रोज़ाना के खेल में एक का नफा, दूसरे का नुकसान होता है। अपने यहां विदेशियों से उलट चलती हैं देशी संस्थाएं। इसके दम पर एलआईसी ने 2014-15 में बाज़ार से 24,373 करोड़ रुपए का मुनाफा बटोरा है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी