ट्रेडिंग में हम किसी शेयर के तात्कालिक आवेग को भुनाते हैं। इसलिए हफ्ते, दस दिन या महीने, दो महीने में फायदा कमाकर वहां से निकल लेते हैं। लेकिन, जब हम अच्छे प्रवर्तक की बढ़ते धंधे में लगी उभरती कंपनी में निवेश करते हैं तो फटाफट निकलने की कतई नहीं सोचनी चाहिए क्योंकि उसका बिजनेस बराबर बढ़ते जाना है जिसके ताप से उसका शेयर भी चढ़ता चला जाता है। आज तथास्तु में ऐसी ही एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

अमिताभ बच्चन से लेकर सचिन तेंदुलकर तक को भगवान माननेवालों की कमी नहीं। पर हकीकत यही है कि किसी को भी भगवान मानने से अपना भला नहीं होता, भले ही उनकी मार्केटिंग वालों का भला हो जाए। इसी तरह ट्रेडिंग में भावों को भगवान माना जाता है। मगर, वास्तव में भाव कंपनी का सच नहीं, ट्रेडरों की भावनाओं का सच दिखाते हैं। इसीलिए हताशा और उन्माद के पेन्डुलम पर झूलते हैं। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार बजट के खुमार में जितना चढ़ा था, उतना उतर चुका है। बजट के दो दिन पहले 26 फरवरी को निफ्टी 8683.85 पर बंद हुआ था। कल इससे थोड़ा नीचे जाने के बाद 8699.95 पर बंद हुआ। इस दौरान दस ट्रेडिंग सत्रों में निफ्टी नीचे में 8669.45 से ऊपर में 9119.20 तक गया। 449.75 अंक या 5.19% का अंतर! ऐसी लहरें बाज़ार में आती-जाती रहती हैं और कुशल ट्रेडर इसका फायदा उठाते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

जीवन का सारा ज्ञान-विज्ञान जो हो चुका है, उसकी तह में पैठने से निकलता है। इसके आधार पर आगे जो हो सकता है, उसका अनुमान लगाया जाता है। यह अनुमान सही हो सकता है और गलत भी। गलत हुआ तो नए मिले तथ्यों के आधार पर नई परिकल्पना या हाइपोथिसिस की जाती है और परीक्षणों पर उसे कसकर नया ज्ञान-विज्ञान निकाला जाता है। ट्रेडिंग को भी साधने की यही प्रक्रिया है। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार इस मामले में आम बाज़ारों से अलग है कि यहां भाव गिरने पर खरीदार भी बिकवाल बन जाते हैं और बाज़ार गिरता जाता है। वहीं, आम बाज़ार में माल का दाम गिरने पर खरीदनेवाले बढ़ जाते हैं। दरअसल वित्तीय बाज़ार में भाव आशा या निराशा के चलते बढ़ते-घटते हैं। यहां अलग किस्म की भावना काम करती है। सफल ट्रेडर भाव को भावना से मुक्त करके देखता है। कोशिश करें अब मंगलवार की नब्ज पकड़ने की…औरऔर भी