हड़बड़ी में गड़बड़ी हो ही जाती है। लेकिन कभी-कभी पूरी मशक्कत के बाद निकाला गया ट्रेड का आइडिया भी फेल हो जाता है। इसीलिए कहते हैं कि ट्रेडिंग में अच्छा आइडिया ज़रूरी तो है, पर पर्याप्त नहीं। वो तब पर्याप्त बनता है, जब रिस्क संभालने का बंदोबस्त चौकस रखा जाए। इसके लिए 2%-6% का बुनियादी नियम है। साथ ही किसी एक ट्रेड में हमें पोर्टफोलियो का 5% से ज्यादा भाग नहीं लगाना चाहिए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बढ़ने का नाम ज़िंदगी। जो ठहरा, वो निपटा। कंपनियों पर भी यह बात बराबर लागू होती है। धंधा लगातार बढ़े तो उसके शेयर चढ़ते हैं। किसको पता था कि फरवरी 1993 में 95 पर जारी इनफोसिस के शेयर इक्कीस साल बाद 4150 तक जानेवाले हैं। वो भी पांच बार 1:1 और एक बार 3:1 में बोनस शेयर के बाद। इसलिए यहां महंगा सस्ता 52 हफ्ते के उच्चतम/न्यूनतम से नहीं तय होता। तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

हम बैंकों की एफडी, डाकघर बचत, पीपीएफ या लघु बचत योजनाओं में जो भी धन जमा करते हैं, उससे सरकार को सस्ता कर्ज मिल जाता है जिससे वह आमदनी से ज्यादा की गई फिजूलखर्ची या अपने राजकोषीय घाटे को पाटती है। इसी क्रम में उसने किसान विकास पत्र (केवीपी) को फिर से ज़िदा किया है। लेकिन खुद वित्त मंत्री जेटली ने बताया है कि यह करेंसी नोटों जैसा एक बियरर प्रपत्र है जिस पर किसी का नामऔरऔर भी

शेयर या अन्य वित्तीय प्रपत्रों की ट्रेडिंग को हमने भौकाल समझ रखा है, जबकि यह मूलतः किसी दूसरे व्यापार जैसा है। कोई इलेक्ट्रॉनिक सामानों का व्यापार करता है, कोई जनरल स्टोर चलाता है तो कोई सब्जी-भाजी की दुकान करता है। सभी थोक के भाव खरीदकर रिटेल के भाव बेचते हैं। अंतर बस इतना है कि शेयर बाज़ार में थोक बाज़ार अलग से नहीं लगता। हमें थोक भाव खुद पता करना होता है। अब समझें शुक्रवार की ट्रेडिंग…औरऔर भी

ऑफिस में आपको सुविधा रहती है कि चट जाने पर आप साथ के लोगों के साथ गप-शप कर सकते हैं, कैंटीन में जा सकते हैं। लेकिन ट्रेडिंग एक तरह की साधना है जिसे आपको अकेले ही पूरा करना पड़ता है। तलवार की धार पर चलने जैसा काम है। इसमें व्यवधान नहीं चाहिए क्योंकि ध्यान टूटा तो आप भावना या असावधानी में नुकसानदेह फैसला ले सकते हैं। इनपुट जगह-जगह से, लेकिन फैसला अपना। अब देखें गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी