हर चीज की अति हमेशा बुरी ही होती है, प्रतिक्रिया की भी। खासकर अति-प्रतिक्रिया निवेशक पर ज्यादा ही चोट करती है। मुद्रास्फीति, ब्याज दरों में वृद्धि और यहां से निकलकर विदेशी पूंजी के विकसित देशों में जाने को लेकर निफ्टी जिस तरह 200 दिनों के मूविंग एवरेज (डीएमए) से नीचे चला गया, वह निश्चित रूप से बाजार की अति-प्रतिक्रिया को दर्शाता है। ऐसा ही 2008 में लेहमान संकट के बाद हुआ था, जब तमाम ब्रोकर ढोल पीटऔरऔर भी

स्विटजरलैंड का कहना है कि उसे करचोरों की पनाहगार समझना उचित नहीं है और वह भारत के साथ आयकर मामलों में सहयोग की नई संधि को इस साल मंजूरी मिल जाने के बाद कालेधन के खिलाफ कार्रवाई में उसको प्रशासनिक सहयोग दे सकेगा। स्विटजरलैंड के वित्त विभाग के मंत्री माइकल एमबल ने शनिवार को दावोस में वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के समारोह से बाहर भारत के एक निजी समाचार चैनल के साथ एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘हमने हालऔरऔर भी

दो साल पहले वर्ष 2008- 09 में दुनिया को हिलाकर रख देनी वाली आर्थिक मंदी के लिए आखिर कौन जिम्मेदार था, इसका पता लगाते हुए एक अमेरिकी समिति ने कहा है कि लोगों की कारगुजारी से लेकर नियामक विफलता और नीति निर्माता सभी इस संकट के लिए जिम्मेदार रहे हैं। वित्तीय संकट जांच आयोग की 500 से अधिक पृष्ठों की रिपोर्ट में यह बात कही गई है। अमेरिकी संसद ने संकट के कारणों का पता लगाने केऔरऔर भी

उबलते पानी में देखी छवि को सही कैसे मान लेते हो भाई? मन को शांत करो। गुस्से से बाहर निकलो। गुस्से से उबलती अपनी छवि के दर्शन करो। तभी जाकर असली छवि को देख पाएंगे आप।और भीऔर भी