फरवरी 2010 तक देश भर में किसानों को 3.08 लाख करोड़ रुपए का कर्ज दिया गया है। इस तरह सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए वित्त वर्ष 2009-10 में तय किए गए कर्ज वितरण के लक्ष्य का तकरीबन 95 फीसदी हिस्सा पूरा कर लिया है। कृषि मंत्रालय की तरफ से दी गई जानकारी में बताया गया गया है कि पूरे वित्त वर्ष के लिए कृषि ऋण का लक्ष्य 3.25 लाख करोड़ रुपए था। अभी तक बांटे गएऔरऔर भी

यूरो जोन में चल रहे संकट के चलते भारतीय रुपया डॉलर के सापेक्ष मंगलवार को करीब आठ महीनों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। यह बंद तो हुआ 47.71/72 रुपए प्रति डॉलर की विनिमय दर पर, लेकिन दिन में एक समय 47.75 तक चला गया था जो 1 नवंबर 2009 का स्तर है। सोमवार को रुपए की विनिमय दर 46.98/99 प्रति डॉलर थी। असल में व्यापारियों के मुताबिक इसकी प्रमुख वजह यह है कि यूरो डॉलर केऔरऔर भी

सोने का भाव मंगलवार को दिल्ली सर्राफा बाजार में 18660 रुपए की नई ऊंचाई पर पहुंच गया। सोने (99.9 शुद्धता) के भाव में प्रति दस ग्राम 260 रुपए की तेजी दर्ज की गई। इसकी एक वजह शादी के सीजन के चलते स्टॉकिस्टों व ज्वैलरों की खरीद बताई जा रही है। दूसरी वजह यह बताई जा रही है कि शेयर बाजार में गिरावट के चलते बड़े निवेशक अपना पैसा अब सोने में लगा रहे हैं। सोना जेवराती भीऔरऔर भी

वैश्विक बाजार के असर से हमारे शेयर बाजार रोज नीचे ही नीचे जा रहे हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था के पहलू मजूबत हैं। इसलिए जी एस दामाणी जैसे तेजतर्रार ऑपरेटरों ने अच्छी संभावना वाले शेयरों पर निगाह जमा दी है और वे इनमें हर गिरावट पर अपनी खरीद बढ़ा रहे हैं। बाजार में अंदर की खबर रखनेवालों का कहना है कि ऐसे कुछ संभावनामय शेयर हैं – बॉम्बे डाईंग, सेंचुरी, आइडिया, भारती, टाटा स्टील, स्टरलाइट, आईडीबीआई, एसबीआई, एस्सार ऑयलऔरऔर भी

देश की सबसे बडी एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर सही ही दावा करती है कि हर तीन में से दो भारतीय उसका कोई न कोई ब्रांड रोजाना इस्तेमाल करते हैं। बाकी एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे है, नहीं तो वो भी करती। चाय से लेकर सूप, आटे से लेकर पानी, साबुन से लेकर शैंपू, घर की सफाई से लेकर दांतों की सफाई तक… कहां नहीं है हिंदुस्तान लीवर। लेकिन लोगों के दिमागऔरऔर भी

टेक्निकल चार्ट के ग्राफ नीचे-नीचे डूब गए तो निवेशकों का भरोसा भी डूब रहा है। पूरे बाजार में डर छा गया है। खरीदार कोई भी नया सौदा करने से डर रहे हैं। निवेशक नफा-नुकसान जो भी, उसी पर बेचकर निकल लेना चाहते हैं। उन्हें बिजनेस चैनलों पर जिस तरह हर तरफ हताशा-निराशा दिखाई जा रही है, उसके अलावा कुछ नहीं दिख रहा। यूरोप के बाजार हर दिन खुलने पर धराशाई हो रहे हैं। अमेरिकी बाजार इन्हीं केऔरऔर भी

कोई कहता है पैसा तो हाथ की मैल है। दूसरा कहता है यह सब हमारे बड़े बुजुर्गों का ढकोसला था और सभी पैसे के पीछे भागते रहे हैं। कुबेर का खजाना, कारूं का खजाना, गड़ा हुआ धन, पैसे का पेड़। न जाने कैसी-कैसी मान्यताएं रहीं हैं अपने यहां। सब समय-समय की बात है। समय बदल चुका है, पैसे की हकीकत भी बदल चुकी है। खुदाई में मिले धन की खबर पुलिस को नहीं दी तो जेल जानाऔरऔर भी

आजकल तो जिस भी आर्थिक फोरम या उद्योग के सेमिनार में जाओ, वहां एसएमई (लघु व मध्यम उद्योग) का नाम जरूर सुनने को मिल जाता है। यह क्षेत्र पिछली मंदी से बुरी तरह चोट खाने के बाद पटरी पर लौटने की पुरजोर कोशिश में लगा है। कुछ को फाइनेंस समय पर मिल जा रहा है, दूसरों से बढ़ी-चढ़ी ब्याज ली जा रही है तो बाकी तय नहीं कर पा रहे हैं कि नई शुरुआत करें या हथियारऔरऔर भी

मुद्रा को अंग्रेजी में मनी कहते हैं जो खुद लैटिन के शब्द मोनेटा से निकला है। इटली को लोक कथाओं के अनुसार मोनेटा स्वर्ग की रानी, देवी जूनों का शुरुआती नाम है। प्राचीन काल में रोम में सिक्कों की ढलाई का काम भी जूनों के मंदिरों में होता था। शायद यही चलन मोनेटा से होते हुए मनी तक पहुंचने का सबब बन गया। आज तो मुद्रा को रेलवे स्टेशन पर शंटिंग करनेवाले इंजिन की तरह मानते हैंऔरऔर भी

प्रकृति में कुछ भी बेकार नहीं जाता। खाद बन जाता है। इसी तरह समाज में जो भी खुद को मिसफिट पाते हैं, वे असल में कल के सृष्टि बीज होते हैं। इन्हें हालात से घबराने के बजाय कल की तैयारी में जुट जाना चाहिए।और भीऔर भी