इस समय पूंजी बाजार से रिटेल निवेशक या आम निवेशक कन्नी काट चुके हैं। सेकेंडरी बाजार या शेयर बाजार में उनका निवेश लगभग सूख चुका है। दूसरी तरफ, जो प्राइमरी बाजार कुछ साल पहले तक आम निवेशकों का पसंदीदा माध्यम बना हुआ था, वहा भी अब आईपीओ (शुरुआती पब्लिक ऑफर) व एफपीओ (फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर) में लोगबाग पैसे नहीं लगा रहे हैं। लगाएं भी तो कैसे। कमोबेश हर आईपीओ या एफपीओ लिस्ट होने के बाद इश्यू मूल्यऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने तय कर दिया है कि 1 जून 2010 के बाद से कोई भी व्यक्ति तब तक किसी भी रूप में म्यूचुअल फंड उत्पाद नहीं बेच सकता, जब तक उसने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्यूरिटीज मार्केट्स (एनआईएसएम) से जरूरी परीक्षा पास कर सर्टिफिकेट न हासिल कर लिया हो। यह शर्त म्यूचुअल फंड के वितरकों व एजेंटों से लेकर ऐसी किसी भी व्यक्ति पर लागू होती है जो किसी न किसी रूप में म्युचुअलऔरऔर भी

कोई आपसे पूछे कि भारतीय अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है तो आप बेझिझक बता सकते हैं कि यह अभी 44,64,081 करोड़ रुपए की है, वह भी तब जब इसमें से 2004-05 के बाद की मुद्रास्फीति या महंगाई के असर को निकाल दिया गया है। अगर सारा कुछ आज की कीमत के हिसाब से बोलें तो हमारी अर्थव्यवस्था का आकार 58,68,331 करोड़ रुपए का है। लेकिन हम महंगाई के असर को जोड़कर नहीं, हटाकर ही बात करते हैं क्योंकिऔरऔर भी

ग्रीस के ऋण संकट जैसे कई मुद्दों के बीच से गुजरते हुए बाजार (निफ्टी) ने 4800 से 5088 तक का लंबा फासला तय कर लिया। ध्यान दें, ये मुद्दे रोलओवर के ठीक पहले उछाले गए और हल्ला मचाया गया कि अब सेंसेक्स 12,000 तक गिर जाएगा। क्या कहें, अपने यहां यह बराबर का चक्कर बन गया है क्योंकि बाजार को चलाने व नचाने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि हमारे स्टॉक एक्सचेंज ऐसे खिलाड़ियों से भरेऔरऔर भी

देश की आबादी करीब 118 करोड़ हो चुकी है। लेकिन हमारे सभी बैंकों में कुल बचत खातों की संख्या केवल 15 करोड़ है। ऐसा तब है जबकि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा बैंकिंग तंत्र है जिसमें कुल करीब 79,000 शाखाएं व एटीएम वगैरह शामिल हैं। रिजर्व बैंक, नाबार्ड व राज्य सरकारों की तमाम कोशिशों के बाद 8.6 करोड़ घरों तक स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के जरिए बैंकिंग सेवा को पहुंचाया गया है। देश भर में बचतऔरऔर भी

हमारी दो-तिहाई खेती अब भी मानसून आधारित है। मौसम और मानसून खराब हुआ तो इन इलाकों की सारी फसल चौपट हो जाती है, किसान बरबाद हो जाते हैं। सरकार ने कहने को राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) चला रखी है। मौसम आधारित फसल बीमा योजना (डब्ल्यूबीसीआईएस) भी है। इसके लिए मौसम के सही आंकड़ों का होना जरूरी है। लेकिन अभी स्थिति यह है कि देश में कुल 14.10 लाख हेक्टेयर जमीन में खेती की जाती है, जबकिऔरऔर भी

पानी बहता नहीं तो सड़ता है। यही बात पैसे और बचत पर भी लागू होती है। बांधकर रखेंगे तो वह घुटता रहेगा, क्षीण होता रहेगा। पैसे को पानी की तरह बहाना गलत है। लेकिन उसे सही माध्यमों में निवेश करना जरूरी है।और भीऔर भी

हफ्ते की शुरुआत अर्थव्यवस्था की एक बड़ी तस्वीर के साफ होने, पारदर्शिता से हो रही है। आज सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीपीडी) के आंकड़े पेश करनेवाली है। यह अर्थव्यवस्था ही नहीं, पूरे बाजार के लिए बहुत अहम जानकारी है। निफ्टी में काफी शॉर्ट सौदे हो रखे हैं। इनकी कवरिंग के चलते बाजार शुरुआत में बढ़ सकता है। कुछ रिसर्च आधारित तहकीकात के बाद इस हफ्ते के लिए चार शेयरों की शिनाख्त की गई है। ये शेयर हैंऔरऔर भी

इस समय सरकार व स्टॉक एक्सचेंजों के पास निवेशकों की सुरक्षा के लिए लगभग 1600 करोड़ का फंड है। इसमें से कॉरपोरेट मामलात मंत्रालय के पास 500 करोड़, बीएसई के पास 432 करोड़, एनएसई के पास 353 करोड़ और क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंजों के पास 300 करोड़ रुपए का फंड जमा है। इसके अलावा सेबी दोषी कंपनियों या व्यक्तियों से जो पेनाल्टी वसूल करती है वह भारत सरकार की समेकित निधि में चली जाती है। लेकिन इतने फंडऔरऔर भी

अगर कोई नीति कभी भी लागू नहीं हो पा रही है तो पक्की बात है कि उस नीति में कोई बुनियादी खामी है। इसलिए जो कानून लागू नहीं हो पा रहे हैं, उनमें यह तलाशने की जरूरत है कि उनका नट-बोल्ट कहां से ढीला है।और भीऔर भी