स्वीडन से निकले और ब्रिटेन में जमे ईसाब समूह की भारतीय सब्सडियरी ईसाब इंडिया के बारे में हमने सबसे पहले यहां करीब तेरह महीने 16 फरवरी 2011 को लिखा था। तब इसका दस रुपए अंकित मूल्य का शेयर 480.30 रुपए तक चल रहा था। करीब सात महीने बाद 14 सितंबर 2011 को यह 591.30 रुपए तक चला गया। सात महीने में 23 फीसदी से ज्यादा का रिटर्न। लेकिन उसके बाद गिरते-गिरते 20 दिसंबर 2011 को 422 रुपएऔरऔर भी

गिरते हैं घुड़सवार ही मैदाने जंग में। किरण मजूमदार-शॉ की कंपनी बायोकॉन को करीब हफ्ते भर पहले तगड़ा झटका लगा, जब फाइज़र ने उसके बनाए इंसूलिन उत्पादों को अमेरिका में बेचने का करार रद्द कर दिया। दोनों की तरफ से जारी साझा बयान में कहा गया, “बायोसिमिलर बिजनेस में अपनी अलग प्राथमिकताओं के चलते कंपनियां इस नतीजे पर पहुंची हैं कि स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने में ही उनका सर्वोपरि हित है।” धंधे में रिश्ते बनते हैं,औरऔर भी

ट्रेडिंग के लिए हम ऐसे स्टॉक्स चुनते हैं जो खरीद-फरोख्त के असर से घट-बढ़ सकते हैं, जबकि निवेश में हम ऐसी कंपनियों को चुनते हैं जिनका धंधा पुख्ता आधार पर खड़ा हो और जिसमें बढ़ने की भरपूर गुंजाइश हो। दिक्कत है कि हममें से 99 फीसदी लोग ट्रेडिंग की मानसिकता रखते हैं। छाया के पीछे भागते हैं और माया गंवाते रहते हैं। यह रुख न तो देश की अर्थव्यवस्था और न ही हमारे दीर्घकालिक आर्थिक स्वास्थ्य केऔरऔर भी

हमें इस बात को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि सेल मार्केटिंग की एक बाजीगरी है जिसके चलिए उपभोक्ताओं की मानसिकता को भुनाया जाता है। शेयर बाजार में भी हर साल इस तरह की ‘क्लियरेंस’ सेल तीन बार लगती है, जिसमें बेचनेवाले अपना माल निकालते हैं। पहली बजट के आसपास, दूसरी दीवाली पर और तीसरी नई साल की शुरुआत पर। सेल में लोगबाग टूटकर भाग लेते हैं। जब उन्हें कोई रोक नहीं सकता तो आपको कोईऔरऔर भी

वित्त मंत्री ने अपने हिसाब से शेयर बाजार को लुभाने की बहुत कोशिश की। एसटीटी (सिक्यूरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स) घटा दिया। ग्राहकों की तंगी से त्रस्त बाजार में नए रिटेल निवेशकों को खींचकर लाने के लिए एकदम तरोताजा, राजीव गांधी इक्विटी सेविंग स्कीम शुरू कर दी। आईपीओ लाने की प्रक्रिया आसान कर दी। इसकी लागत घटा दी। कंपनियों को छोटे शहरों के और ज्यादा निवेशकों तक पहुंचने में मदद की। दस करोड़ रुपए से ज्यादा के आईपीओ कोऔरऔर भी

चुनाव न होते तो बजट का रहस्य 16 दिन पहले ही खुल जाता। चलिए, इससे वित्त मंत्री और उनके अमले को अपने प्रस्तावों को ठोंक-बजाकर दुरुस्त करने के लिए ज्यादा वक्त मिल गया। लेकिन हम तो उन्हीं के भरोसे हैं तो हमें क्या वक्त मिलना और क्या न मिलना! इतना तय है कि बजट की एक-एक लाइन किसी न किसी रूप में कंपनियों के धंधे पर असर डालती है और इसका सीधा असर उनके शेयरों पर पड़ेगा।औरऔर भी

माहौल जब देश के सबसे अहम सालाना दस्तावेज, बजट के आने का हो, तब खुद को किसी स्टॉक विशेष की चर्चा तक सीमित रखना ठीक नहीं लगता। वैसे भी सिर्फ शेयर या इक्विटी ही निवेश का इकलौता माध्यम नहीं है। आम लोग भी कहां शेयर बाजार में धन लगा रहे हैं! वित्तीय बाजार में उनके पसंदीदा माध्यम हैं निश्चित आय देनेवाले प्रपत्र। मुख्य रूप से एफडी। बांडों में निवेश का मौका मिले तो लोग कतई नहीं चूकते।औरऔर भी

ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज में निवेश की सलाह हमने सबसे पहले करीब नौ महीने पहले 15 जून 2010 को दी थी। उस वक्त यह शेयर बहुत उछलकूद मचा रहा था। महीने भर में ही 40 फीसदी से ज्यादा बढ़कर 445 रुपए पर पहुंच चुका था। इस समय भी इसमें तेज हरकत है। 10 फरवरी को इसने दिसंबर तिमाही के नतीजे घोषित किए, तब इसका बंद भाव 493.95 रुपए था। उसके बाद करीब एक महीने में यह 14.44 फीसदी बढ़करऔरऔर भी

पेट्रोन इंजीनियरिंग नाम के अनुरूप इंजीनियरिंग व कंस्ट्रक्शन के काम में लगी कंपनी है। तेल व गैस, रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल, उर्वरक, सीमेंट व बिजली जैसे उद्योगों को अपनी सेवाएं बेचती है। यह 1976 में बनी कंपनी है। चार साल पहले तक पूरी तरह भारतीय कंपनी हुआ करती थी। लेकिन जनवरी 2008 के बाद से इसका नियत्रंण एक ब्रिटिश कंपनी काज़ स्ट्रॉय सर्विसेज (केएसएस) के हाथ में चला गया है। वैसे तो केएसएस के पास कंपनी की 20.13 फीसदीऔरऔर भी

यूं तो महज कागज की एक पट्टी होता है लिटमस। लेकिन द्रव में डालते ही खटाक से बता देता है कि वो अम्ल है या क्षार। काश! शेयर बाजार के लिए भी ऐसा कोई इकलौता लिटमस टेस्ट होता जो बता देता कि कोई कंपनी निवेश के काबिल है या नहीं। मुश्किल यह है कि यहां वर्तमान को ही नहीं, भविष्य को भी परखा जाता है। कई टेस्ट हैं। लेकिन वे आंशिक सच ही दिखाते हैं। अगर हमऔरऔर भी