अच्छा-अच्छा, फिर भाव क्यों नहीं!

वित्त मंत्री ने अपने हिसाब से शेयर बाजार को लुभाने की बहुत कोशिश की। एसटीटी (सिक्यूरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स) घटा दिया। ग्राहकों की तंगी से त्रस्त बाजार में नए रिटेल निवेशकों को खींचकर लाने के लिए एकदम तरोताजा, राजीव गांधी इक्विटी सेविंग स्कीम शुरू कर दी। आईपीओ लाने की प्रक्रिया आसान कर दी। इसकी लागत घटा दी। कंपनियों को छोटे शहरों के और ज्यादा निवेशकों तक पहुंचने में मदद की। दस करोड़ रुपए से ज्यादा के आईपीओ को स्टॉक एक्सचेंजों के देशव्यापी ब्रोकर नेटवर्क के जरिए इलेक्ट्रॉनिक रूप में लाना जरूरी कर दिया। लेकिन बाजार ने उसकी कोशिशों को कोई भाव नहीं दिया।

वित्त मंत्री ने कंपनियों के फैसलों के शेयरधारकों की भागीदारी बढ़ाने की भी कोशिश की है। कंपनियों के अहम फैसलों में शेयरधारकों की व्यापक शिरकत के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सुविधा मुहैया कराई जाएगी। शुरुआत प्रमुख लिस्टेड कंपनियों में इसे अनिवार्य करने से की जाएगी। उन्होंने अलग-अलग उद्योगों के लिए भी बहुत कुछ किया है। क्या-क्या किया है, इसकी तहकीकात से आज के तमाम बिजनेस अखबार पटे पड़े हैं। बिजनेल चैनल भी लगातार इस पर चर्चा जारी रखेंगे। आप चाहें तो इन सभी चर्चाओं को लाभ उठा सकते हैं। अपनी तरफ से हम इस मसले पर विशेष कुछ नए हफ्ते के शुरू में ही लिखेंगे। फिलहाल देखते हैं कि पिछले दिनों हमने क्या नया कुछ जाना-समझा।

  • काश! शेयर बाजार के लिए भी ऐसा कोई इकलौता लिटमस टेस्ट होता जो बता देता कि कोई कंपनी निवेश के काबिल है या नहीं। टेस्ट तो कई हैं। लेकिन वे आंशिक सच ही दिखाते हैं। अगर हम इन सभी टेस्टों को एक साथ लगा भी दें तब भी अनिश्चितता का बिंदु रह जाता है। इसीलिए शेयर बाजार के निवेश में जोखिम का तत्व हमेशा घुसा रहता है। किसी स्टॉक की औकात को समझने के लिए चार खास टेस्ट हैं। एक, कंपनी में एफआईआई या विदेशी संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी। दो, प्रवर्तकों द्वारा गिरवी रखे या प्लेज किए गए शेयर। तीन, कंपनी का ऋण इक्विटी अनुपात। और चार, उसका ब्याज कवरेज अनुपात कितना है। अगर कंपनी में एफआईआई की शेयरधारिता 20 फीसदी से ज्यादा है तो उसमें भूचाल आने की आशंका ज्यादा रहती है। अगर प्रवर्तकों ने अपने हिस्से की इक्विटी का 30 फीसदी से ज्यादा गिरवी रखा हुआ है तो लाख अच्छी होने के बावजूद आम निवेशकों को उससे दूर रहना चाहिए। तीसरे, अगर किसी कंपनी का ऋण इक्विटी अनुपात एक से ज्यादा है तो समझ लीजिए कि उसमें निवेश करना खतरे से खाली नहीं। और चार, उसका इंटरेस्ट कवरेज अनुपात अगर कम है तो खतरा, ज्यादा है तो ठीक।
  • बात एकदम सीधी है। जो भी शेयर बाजार में निवेश नहीं करते, वे भारत की विकासगाथा के लाभ से वंचित है। लेकिन आश्चर्यजनक, किंतु सत्य यह है कि देश की 121 करोड़ की आबादी में से कम से कम 120 करोड़ लोग इस लाभ से वंचित हैं, जबकि ठीकठाक कमानेवाले भारतीय मध्य वर्ग की ही आबादी 15 करोड़ से ज्यादा है। सबको साथ लेनेवाले कौन-से समावेशी विकास की बात करती यह सरकार? देश की विकासगाथा को व्यापक जनाधार देने के लिए इक्कीस साल कोई कम नहीं होते! वह भी तब, जबकि तब के वित्त मंत्री ही अभी के प्रधानमंत्री हों!!
  • शेयर बाजार में हाथी के पैर की छाप देखकर उसे पैर में चक्की बांधकर हिरण का चलना बताने का लाल बुझक्कड़ी अंदाज नहीं चल सकता। यहां जो कुछ भी है, उसे समग्रता में समझना पड़ता है। मोटी-सी बात यह है कि जब भी किसी कंपनी का शेयर इस तरह सातवें आसमान से गिरकर पाताल तक पहुंचे तो समझना लेना चाहिए कि उसके साथ जरूर कोई समस्या है। असल में किसी शेयर के मूल्य का इतिहास अपने आप में बहुत कुछ कह देता है।
  • शेयर बाजार या किसी खास शेयर में बढ़त के दो ही आधार होते हैं। एक, अर्थव्यवस्था या कंपनी के मजबूत होते फंडामेंटल। दो, बढ़ी हुई तरलता, यानी खरीदने के लिए ज्यादा रकम का आना। इस साल जनवरी से लेकर अब तक चली तेजी की बड़ी वजह है विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) द्वारा किया गया ज्यादा निवेश। लेकिन सिर्फ उनकी ही खरीद से बाजार नहीं बढ़ता। आंकड़े इस बात की तस्दीक करेत हैं कि लकीर के फकीर की तरह गिरावट का सारा दोष हमेशा एफआईआई पर डालना गलत है।
  • चुटकी भर टिप्स, मुठ्ठी भर मंत्र। यही अपना मूल मकसद है। टिप्स तो बहाना है, असली काम तो आपको बताना है शेयर बाजार ही नहीं, पूरे वित्तीय बाज़ार की बारीकियों के बारे में ताकि कोई आपको झांसा न दे सके और आप अपने फैसले खुद ले सकें। ऐसे में हर बड़ी खबर या घटना का इस्तेमाल हमें जानने-समझने के मौके के रूप में करना चाहिए।

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