चाहे हम नियमित आय के लिए शॉर्ट-टर्म ट्रेड कर रहे हों या दौलत जुटाने के लिए लांग-टर्म निवेश कर रहे हों, हमारा लक्ष्य यही है कि हम कम से कम जोखिम में अधिक से अधिक मुनाफा कैसे कमा सकते हैं। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी है भावों के उस स्तर की सटीक शिनाख्त जहां से कोई स्टॉक या बाज़ार तेज़ी से पलटता है। दरअसल, इन टर्निंग प्वाइंट्स को पकड़ना ही न्यूनतम रिस्क उठाकर अधिकतमऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग एक तरह का बिजनेस है। इसमें बराबर हर सौदे में मुनाफा कमाना संभव नहीं। यह दुनिया भर के अनुभवी ट्रेडरों का सबक है। कई बार घाटा उठाना पड़ता है। यह घाटा न्यूनतम हो, इसके लिए स्टॉप-लॉस का अनुशासन बना है। इसलिए हर ट्रेड में एंट्री के साथ-साथ स्टॉप-लॉस का स्तर तय करना ज़रूरी है। दरअसल, स्टॉप-लॉस के घाटे को इस बिजनेस की लागत माना जाता है। अब उतरते हैं आज के बाज़ार में…औरऔर भी

बाज़ार सरकार तक की नहीं सुनता। वित्त मंत्री चिदंबरम से लेकर रिजर्व बैंक तक रुपए को चढ़ाना चाहते हैं। लेकिन इन सबको धता बताते हुए रुपया डॉलर के मुकाबले 68.83 तक जा गिरा। एक दिन में 3.83% की गिरावट। यह एक मार्च 1993 के बाद किसी एक दिन में हुई सबसे बड़ी गिरावट है। शेयर बाज़ार सपाट। सोना चढ़ा 34,238 रुपए प्रति दस ग्राम तक। सबक? बाज़ार से पंगा मत लो। बस देखते रहो बाज़ार की धार…औरऔर भी

डॉलर का 66.30 रुपए हो जाना सरकार की अदूरदर्शी नीतियों का नतीजा है। इसे संभालने का कोई शॉर्टकट नहीं। समस्या यह है कि भारतीय मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की उत्पादकता घट गई है। दुनिया में भारतीय मालों के पिटने से हमारा व्यापार घाटा 195 अरब डॉलर हो चुका है। सेवा उद्योग और अनिवासी भारतीय देश में 105 अरब डॉलर ला रहे हैं। इस तरह बची 90 अरब डॉलर की कमी कोहराम मचाए हुए है। फिर, कैसे बढ़े शेयर बाज़ार?औरऔर भी

हर दिन बाज़ार से घनेरों सूचनाएं निकलती हैं। इनमें से काम की सूचना निकालना और विश्लेषण करना कठिन है। फिर तमाम संकेतकों में इन्हें बैठा कर किसी नतीजे पर पहुंचना कठिन है। स्टॉक एनालिस्ट बनना भी कठिन है, बशर्ते यह नौकरी कहीं न मिल जाए। लेकिन ट्रेडिंग करना और भी कठिन है। चार्ट बना लिया। पर चार्ट का दाहिना हिस्सा खाली है। इसे भरने का हुनर अनुभव, अध्ययन, अभ्यास व अनुशासन से आता है। बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

इतिहास भले अपने-आप को दोहराता हो। लेकिन कल के आधार पर नहीं तय हो सकता कि आज या कल क्या होगा। टेक्निकल एनालिसिस के साथ यही समस्या है। वो अब तक हो चुकी ट्रेडिंग के आंकड़ों को लेकर भावी गति को बताने का दम भरती है। वो समय से पीछे चलती है। यही वजह है कि शेयर बाज़ार में ऑपरेटर कमाई करते हैं। बाकी ट्रेडर कंगाल होते रहते हैं। हम चलते हैं टेक्निकल एनालिसिस से बराबर आगे…औरऔर भी

वजह बाहरी हो या भीतरी, हकीकत यही है कि अपने यहां अभी एक शेयर 52 हफ्ते के शिखर पर है तो आठ तलहटी पर। गिरनेवालों में एसीसी, सेंचुरी प्लाई, ग्रासिम इंडस्ट्रीज़ और अल्ट्राटेक सीमेंट जैसे तमाम दिग्गज शामिल हैं। क्या तलहटी पर पहुंचा हर शेयर खरीदने लायक है? नहीं। बस नाम व दाम के पीछे भागे तो वैल्यू ट्रैप में फंस जाएंगे। हमें चुननी होगी मजबूत आधार और अच्छे प्रबंधन वाली कंपनी। लीजिए, ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

चार दिन पहले पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने चार फर्मों – राइट ट्रेड, बुल ट्रेडर, लक्ष्मी ट्रेडर्स और साई ट्रेडर पर बैन लगा दिया। इन फर्मों को सूरत से चलाया जा रहा था और इनके पीछे दो लोग थे – इम्तियाज़ हनीफ खांडा और वाली ममद हबीब घानीवाला। घानीवाला इम्तियाज़ का मामा है। ये लोग अपनी वेबसाइट ‘राइट ट्रेड डॉट इन’ के जरिए और मोबाइल पर एसएमएस भेजकर लोगों को शेयर और कमोडिटी बाज़ार से हरऔरऔर भी

जो लोग अंदर हैं वे जानते हैं। लेकिन जो बाहर हैं उनके लिए शेयर बाज़ार किसी प्रेत-साधक तंत्र विद्या या वशीकरण मंत्र से कम नहीं। उनकी इस रहस्यमयी उत्सुकता ने बॉरेन बफेट, बेंजामिन ग्राहम या वान थार्प की किताबों को बेस्टसेलर बना रखा है। जबकि सच यह है कि समाज की रिस्क कैपिटल को नए उद्यमों तक पहुंचाने का जरिया है शेयर बाज़ार और ट्रेडिंग माहौल बनाने का काम करती है। अब पकड़ते हैं बाज़ार की चाल…औरऔर भी

ऐसा क्यों है कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में शेयर बाज़ार के 95% ट्रेडर घाटे में रहते हैं और केवल 5% ही मुनाफा कमाते हैं? इसकी दो वजहें हैं। पहली यह कि ज्यादातर ट्रेडर अपने आगे हर किसी को गधा समझते हैं। दूसरी अहम वजह यह है कि वे टिप्स या टेक्निकल एनालिसिस की गणनाओं पर उछलकूद मचाते हैं। मगर असली कुंजी, धन प्रबंधन के अनुशासन को तवज्जो नहीं देते। चलिए, देखें अब बाज़ार की धूप-छांह…औरऔर भी