अंग्रेज़ी में कहावत है कि एक ही टोकरी में सारे अंडे रखोगे तो टूट जाएंगे। इसीलिए निवेश में पोर्टफोलियो का नियम चलता है। न्यूनतम 40 कंपनियों का पोर्टफोलियो हो तो उनके अलग-अलग रिस्क आपस में कट जाते हैं, बचता है केवल बाज़ार का समग्र रिस्क। इसी तरह ट्रेडिंग में पोर्टफोलियो का नियम कहता है कि 100 रुपए हों तो 5-5 रुपए 20 स्टॉक्स में लगाओ। कुछ विशेषज्ञ 2-2 लगाने की सलाह देते हैं। अब मंगल का मंगलम…औरऔर भी

हड़बड़ी में गड़बड़ी हो ही जाती है। लेकिन कभी-कभी पूरी मशक्कत के बाद निकाला गया ट्रेड का आइडिया भी फेल हो जाता है। इसीलिए कहते हैं कि ट्रेडिंग में अच्छा आइडिया ज़रूरी तो है, पर पर्याप्त नहीं। वो तब पर्याप्त बनता है, जब रिस्क संभालने का बंदोबस्त चौकस रखा जाए। इसके लिए 2%-6% का बुनियादी नियम है। साथ ही किसी एक ट्रेड में हमें पोर्टफोलियो का 5% से ज्यादा भाग नहीं लगाना चाहिए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बढ़ने का नाम ज़िंदगी। जो ठहरा, वो निपटा। कंपनियों पर भी यह बात बराबर लागू होती है। धंधा लगातार बढ़े तो उसके शेयर चढ़ते हैं। किसको पता था कि फरवरी 1993 में 95 पर जारी इनफोसिस के शेयर इक्कीस साल बाद 4150 तक जानेवाले हैं। वो भी पांच बार 1:1 और एक बार 3:1 में बोनस शेयर के बाद। इसलिए यहां महंगा सस्ता 52 हफ्ते के उच्चतम/न्यूनतम से नहीं तय होता। तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

शेयर या अन्य वित्तीय प्रपत्रों की ट्रेडिंग को हमने भौकाल समझ रखा है, जबकि यह मूलतः किसी दूसरे व्यापार जैसा है। कोई इलेक्ट्रॉनिक सामानों का व्यापार करता है, कोई जनरल स्टोर चलाता है तो कोई सब्जी-भाजी की दुकान करता है। सभी थोक के भाव खरीदकर रिटेल के भाव बेचते हैं। अंतर बस इतना है कि शेयर बाज़ार में थोक बाज़ार अलग से नहीं लगता। हमें थोक भाव खुद पता करना होता है। अब समझें शुक्रवार की ट्रेडिंग…औरऔर भी

ऑफिस में आपको सुविधा रहती है कि चट जाने पर आप साथ के लोगों के साथ गप-शप कर सकते हैं, कैंटीन में जा सकते हैं। लेकिन ट्रेडिंग एक तरह की साधना है जिसे आपको अकेले ही पूरा करना पड़ता है। तलवार की धार पर चलने जैसा काम है। इसमें व्यवधान नहीं चाहिए क्योंकि ध्यान टूटा तो आप भावना या असावधानी में नुकसानदेह फैसला ले सकते हैं। इनपुट जगह-जगह से, लेकिन फैसला अपना। अब देखें गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

मुंबई नगरिया में मनोज बाजपेयी जैसे हज़ारों कुशल अभिनेता हैं जिनको एक बार काम मिलता है तो महीनों तक सन्नाटा छा जाता है। वित्त के बाज़ार में मंजे हुए ट्रेडर भी ऐसी ऊंच-नीच से बच नहीं पाते। प्रायिकता का पांसा हमेशा आपके पक्ष में बैठे, यह ज़रूरी तो नहीं। इसलिए अभिनेता से लेकर पूर्णकालिक ट्रेडर तक को महीनों के रसद-पानी का इंतज़ाम करके रखना पड़ता है। इस रिस्क को समझ लें कायदे से। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

ट्रेडिंग से जीविका चलाना आसान नहीं। इसमें तगड़ा अनुशासन चाहिए। सुबह 8 बजे तक तैयार होकर कंप्यूटर पर बैठ जाएं। देखें कि बीती रात हमारे बंद हुए विदेशी बाज़ारों का क्या हाल रहा और आज हमसे पहले खुले एशिया के बाज़ारों की क्या हाल है। फिर, अपने यहां तमाम सूचकांकों का कल क्या हाल रहा। डे-ट्रेडर हैं तो शाम तक बराबर डटे रहना होगा। स्विंग या पोजिशनल ट्रेडर हैं तो बात अलग है। अब मंगल की दशा-दिशा…औरऔर भी

अगर आप ट्रेडिंग से जीविका चलाना ही चाहते हैं तो बड़ी पूंजी के साथ आप को तीन बुनियादी शर्तें पूरी करनी पड़ेंगी। एक, तगड़ा अनुशासन। इसमें समय प्रबंधन सबसे खास है। दो, रिस्क झेलने की भरपूर सामर्थ्य। दिन या हफ्ता छोड़िए, अक्सर सारी तैयारी होने पर भी महीनों तक घाटा उठाना पड़ सकता है। तीन, अकेले काम करने की सुविधा। इन शर्तों को हम अगले कुछ दिनों में खुलकर बताएंगे। तो, करें अब नए हफ्ते का आगाज़…औरऔर भी

हमारे मनाने से कुछ नहीं होता। फिर भी भारत जैसी अर्थव्यवस्था में, जहां बढ़ने की अपार संभावनाएं हों, वहां मनाना चाहिए कि एफआईआई के भागने जैसा कोई छोटा संकट आ जाए ताकि अच्छी कंपनियों के शेयर 20-30% नीचे आ जाएं और हम उन्हें सस्ते में खरीद सकें। खैर, वैसा न भी हो, तब भी हमारे यहां निवेश के बहुतेरे मौके हैं। इन्हीं में खोजकर लाते हैं हम अच्छी कंपनियां। तथास्तु में आज एक ऐसी ही स्मॉलकैप कंपनी…औरऔर भी

कोई होलटाइम ट्रेडिंग करे और महीने में 40,000 रुपए (साल के 5 लाख) भी न कमाए तो क्या फायदा! 25% सालाना रिटर्न पकडें तो इसके लिए 20 लाख की पूंजी चाहिए। इसके ऊपर दो साल का बफर, 10 लाख रखना होगा। इसके अलावा इतनी ही रकम बचत खाते में अलग होनी चाहिए। इस तरह ट्रेडिंग से महीने में 40,000 कमाने के लिए कुल चाहिए 40 लाख रुपए। इतने नहीं तो पार्ट-टाइम ही अच्छा। अब शुक्रवार की गति…औरऔर भी