बाहरी परिस्थितियों पर हमारा वश नहीं। लेकिन उन पर हमारी प्रतिक्रिया हमारे वश में है। बाढ़ सबको बहा ले जाती है। मगर कुशल तैराक उससे बच निकलते हैं। बांध टूट जाए तो पानी गांव के गांव तबाह कर देता है। लेकिन उसी पानी से बिजली भी बनाई जाती है। जो हालात का माकूल इस्तेमाल करते हैं, वे ही आखिरकार जीतते हैं। जीवन का यह सामान्य नियम वित्तीय ट्रेडिंग पर भी लागू होता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अगर ट्रेडिंग या जीवन के किसी भी क्षेत्र में आप अपने फैसलों व काम के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं तो यह एक तरह का पलायनवाद है। नियम-अनुशासन तोड़ने और खुद निर्धारित फ्रेमवर्क का पालन नहीं करने पर कामयाबी आपके हाथ से बाहर निकल जाएगी। ट्रेडिंग में यही चीजें तो आपको औरों से भिन्न करती और जीत दिलाती हैं। बाकी तो प्रायिकता का खेल है जो सबके लिए एकसमान काम करता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सर्वमान्य सच है कि हम शेयर बाज़ार में जो भी सौदे करते हैं, उसके लिए आखिरकार खुद ही ज़िम्मेदार होते हैं। लेकिन यहां तो हर कोई सफलता का श्रेय खुद लेता है, जबकि नाकामी के लिए अपने अलावा हर किसी को दोषी ठहरा देता है। इंटरनेट सुस्त था, ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म सही नहीं था, बीवी-बच्चों या कुत्ते ने परेशान कर रखा था, सलाह देनेवाला गलत निकला। दरअसल, लोगबाग गलत साबित होने से डरते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार को सामान्य बाज़ार की तरह मांग और सप्लाई पर चलनेवाला बाज़ार मान लें तो हमारी समस्या काफी सुलझ जाती है। लेकिन शेयर बाज़ार में मांग और सप्लाई को सही तरीके से कैसे पकड़ा जाए? जवाब है कि रोज़ाना या साप्ताहिक भावों के चार्ट पर उंगली सबसे ताज़ा भाव पर रखें और पीछे वहां तक ले जाएं, जहां से भाव गिरे या उठे थे। उठे थे मांग और गिरे थे सप्लाई पर। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सामान्य बाज़ार में लोगबाग खरीदने के लिए दाम गिरने का इंतज़ार करते हैं, जबकि वित्तीय बाज़ार में खरीदने से पहले अच्छी खबरों और भावों के चढ़ने का इंतज़ार करते हैं। हां, सिद्धांत में बराबर दोहराते हैं कि वित्तीय बाजार से कमाई के लिए निचले स्तर पर खरीदना और ऊंचे स्तर बेचना चाहिए। वित्तीय सलाहकार और विश्लेषक भी यही भाषण पिलाते हैं। अहम सवाल है कि इस सिद्धांत को व्यवहार में कैसे उतारा जाए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

विचित्र विरोधाभास है कि सामान्य बाज़ार में लोगों का रुख वित्तीय बाज़ार से एकदम उलट रहता है। वे ज्यादातर चीजें सेल या डिस्काउंट पर खरीदना पसंद करते हैं, जबकि वित्तीय बाज़ार में चढ़ते शेयरों को खरीदना और गिरते शेयरों को बेचना चाहते हैं। यह शेयर बाज़ार को हौवा समझने से उपजी हीनता ग्रंथि का नतीजा है। सच यह है कि शेयर बाज़ार सामान्य बाज़ार की ही तरह डिमांड-सप्लाई के नियम पर चलता है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

इधर पिछले कुछ महीनों से शेयर बाज़ार में सक्रिय निवेशकों व ट्रेडरों की संख्या बढ़ती जा रही है। दरअसल जब भी बाज़ार बढ़ता है, शेयरों के भाव नई ऊंचाई बनाते हैं, तब ज्यादातर लोगों को शेयर खरीदने में बड़ी सुरक्षा महसूस होती है। वहीं, भावों के गिरने पर वे किसी भी कीमत पर बेचकर निकल लेने की फिराक में रहते हैं। यह मानसिकता दीर्घकालिक निवेश व अल्पकालिक ट्रेडिंग, दोनों के लिए घातक है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

स्वाभाविक व सहज सोच वित्तीय बाज़ार से कमाने के मामले में हमारे किसी काम की नहीं। यह सोच हमें कमज़ोरी से बचाने और सुरक्षा के लिए समूह के साथ चलते को उकसाती है। दिक्कत यह है कि वित्तीय बाज़ार में 95% ट्रेडर गंवाते और 5% ट्रेडर ही कमाते हैं। यहां समूह समझदारी नहीं दिखाता, बल्कि भेड़ों के झुंड की तरह बर्ताव करता है। गड़ेरिये या उस्ताद लोग इन भेड़ों से मुनाफा बटोरते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जब आप यह समझ जाते हैं कि बाज़ार में आपके सौदों या सक्रियता पर खबरों या सूचनाओं का प्रभाव आपके मन में जमी धारणाओं के हिसाब से पड़ता है, तब आप खरीदने या बेचने के सही मौके पकड़ने के लिए यह तलाशने लगते हैं कि भावों के चार्ट पर सच्ची मांग व सप्लाई कहां और कैसे नज़र आती है। टेक्निकल एनालिसिस का सपोर्ट और रेजिस्टेंट सिस्टम इसमें आपकी कोई खास मदद नहीं करता। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

खबर या सूचना को अपनी मान्यता या मन में बैठे सिस्टम की इस कसौटी पर आंकना चाहिए कि वह बाज़ार में स्टॉक की मांग व सप्लाई की सही रिश्ते में कहां फिट बैठती है। अगर आप यह सुनिश्चित कर लें तो वहां खरीदने के ट्रैप में कभी नहीं फंसेंगे जहां सप्लाई मांग से कहीं ज्यादा हो, यानी बेचने को तैयार बैठे उस्तादों का ज़ोर खरीदने को लालालित नौसिखिया ट्रेडरों की बनिस्बत ज्यादा हो। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी