सेक्टर के साथ-साथ कंपनी भी तय कर ली। लेकिन एंट्री और एक्जिट कहां करना है, इसका जवाब संस्थाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए उनकी टीम कंपनी की शेयरधारिता के पैटर्न से लेकर वित्तीय पहलुओं का बारीक विवेचन करती है। इसके बाद भावों का वो ज़ोन तय किया जाता है, जहां एंट्री करनी है और जहां से बाहर निकलना है। उनकी यह हरकत पकड़ लें तो हमारा कल्याण हो सकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सेक्टर तय कर लेने के बाद संस्थागत निवेशक देखते हैं कि उसमें भी कौन-सी कंपनियों के स्टॉक अच्छे चल रहे हैं और उनका फंडामेंटल आधार भी मजबूत है ताकि शेयर गिरे भी तो अंततः संभल जाए। वे कोई नकारात्मक झटका नहीं चाहते। फिर भी बाज़ार है तो अचानक कुछ घटने का खतरा बना ही रहता है। इस जोखिम को साधने के लिए वे पोजिशन साइजिंग से लेकर स्टॉप-लॉस जैसे तमाम तरीके अपनाते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बैंक, बीमा कंपनियां और प्रोफेशनल ट्रेडर एक साथ बाज़ार में हर तरफ हाथ-पैर नहीं मारते। वे गहराई से परखते हैं कि कौन-से सेक्टर में अभी तेज़ी की लहर चल रही है या चलनेवाली है। वे भारतीय मुद्रा से लेकर मुद्रास्फीति जैसे तमाम पहलुओं पर नज़र रखते हैं और उसका फायदा उठाते हैं। मसलन, रुपया डॉलर के सापेक्ष कमज़ोर हो रहा हो तो उन्हें आईटी या फार्मा जैसे निर्यात से कमानेवाले सेक्टर सुहाते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार के गुरुघंटाल एक बार पकड़ लें तो आखिरी बूंद तक निचोड़ लेते हैं। इसलिए उनके चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए। असल में सारी विद्या आपके सामने खुली है। कमियों के बावजूद हमारा शेयर बाज़ार इतना पारदर्शी है कि नज़र व समझ हो तो सब कुछ खुद जान-समझ सकते हैं। मोटी-सी बात यह है कि आपको किसी विशेषज्ञ की सलाह नहीं, बल्कि संस्थाओं की चाल को समझने की पुरज़ोर कोशिश करनी चाहिए। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

ट्रेडिंग भयंकर मायाजाल है। लगता है कि बहुत सारे शेयर एक ही दिन में 4-5% बढ़ जाते हैं तो हम क्यों नहीं कमा सकते। काश, कोई पहले से हमें इनके बारे में बता देता! यहीं पर हम घात लगाए बैठे बहुतेरे गुरुओं व सलाहकारों का शिकार बन जाते हैं। हफ्ते-दस दिन की मुफ्त की सेवा। उसके बाद खुदा-न-खास्ता फंसे तो हज़ारों की फीस। फिर ट्रेडिंग का विकट चक्रव्यूह हमें निचोड़कर फेंक देता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बैंकों या बीमा कंपनियों के लिए कुछ दिनों में 4-5% का मुनाफा पर्याप्त होता है। इतना मुनाफा पाकर वे पहले निकल लेते हैं। फिर शेयर वहां से 2% तक गिर गया तो दोबारा खरीद लेते हैं। जब तक शेयर का भाव निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच जाता, तब वे उसे इसी तरफ फेटते रहते हैं। उनका एक-एक सौदा करोड़ों का होता है, इसलिए 4-5% फायदा भी उन्हें आराम से लाखों दे जाता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बैंक, संस्थाएं या प्रोफेशनल ट्रेडर रिटेल ट्रेडरों की तरह सारे शेयर एकमुश्त नहीं खरीदते। वे धीरे-धीरे कुछ दिनों में पोजिशन बनाते हैं। साथ ही वे सौदा एक नहीं, बल्कि कई ब्रोकरों के ज़रिए करते हैं। एक बार उनको वांछित मात्रा में शेयर मिल जाते हैं, फिर वे फेटना शुरू कर देते हैं। लेकिन इंट्रा-डे कतई नहीं। बैंकों की न्यूनतम होल्डिंग अवधि ट्रेडिंग वाले दिन को छोड़कर दो दिन, यानी टी+2 की होती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ऑपरेटरों के खेल को हमें दूर से ही नमस्कार कर देना चाहिए। लेकिन बैंकों, संस्थाओं व प्रोफेशनल ट्रेडरों के तौर-तरीकों को हम समझ सकते हैं और हमें समझना भी चाहिए। यूं तो इनमें सबकी अलग-अलग ट्रेडिंग स्टाइल होती है। लेकिन यह बात सबमें समान है कि वे फंडामेंटल रूप से मजबूत और लिक्विड कंपनियों में ही ट्रेड करते हैं। लिक्विड मतलब ऐसी कंपनियां जिनके लाखों शेयरों की ट्रेडिंग औसतन हर दिन होती है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में सक्रिय ऑपरेटरों के खेल निराले हैं। तमाम ऑपरेटर कंपनी प्रवर्तकों के साथ मिलकर खेल करते हैं। दरअसल, प्रवर्तकों के पास कंपनी के शेयर घोषित मात्रा से कहीं ज्यादा होते हैं। वे अन्य व्यक्तियों या फर्मों के नाम से शेयर लेकर रखते हैं और इनके ज़रिए अपनी कंपनी के शेयरों को उठाते-गिराते हैं। इन ऑपरेटरों से तो पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी तक नहीं पार पाती। हमें इनसे सतर्क रहना चाहिए। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

किसी भी काम में कामयाबी के लिए सहजता व अपने पर विश्वास बहुत ज़रूरी है। लेकिन शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से नियमित कमाने के वास्ते रिटेल ट्रेडर के लिए ये दोनों ही बातें बड़ी नुकसानदेह होती हैं। कारण, जिस भी तरीके से हमारा विकास हुआ है, उसमें सहजता से निकला इन्ट्यूशन बाज़ार में हमेशा गलत सिग्नल देता है। यहां सफलता का एकमात्र सूत्र है बैंकों, संस्थाओं व प्रोफेशनल ट्रेडरों के सिग्नल को पकड़ना। अब सोम का व्योम…औरऔर भी