विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई या एफआईआई) भारत से खिसक रहे हैं। इस साल जनवरी से लेकर अब तक वे हमारे ऋण व इक्विटी बाज़ार से 32,521 करोड़ रुपए निकाल चुके हैं। इसमें से 29,776 करोड़ रुपए तो उन्होंने केवल मई माह में ही निकाले हैं जिसमें से 10,061 करोड़ रुपए इक्विटी, 19,654 करोड़ रुपए ऋण और 61 करोड़ रुपए हाइब्रिड प्रपत्रों से निकाले गए हैं। आखिर उनके इस बर्ताव की वजह क्या है? अब सोम का व्योम…औरऔर भी

बड़ी स्वाभाविक गलती हम किसी शेयर के बहुत बढ़ने पर भी करते हैं। सोचते हैं, शेयर पहले से 52-हफ्ते के उच्चतम स्तर पर है तो कितना बढ़ेगा! भूल जाते हैं कि जब शेयर चढ़ता रहता है तो उसे खरीदने के आतुर बहुतेरे होते हैं, जबकि बेचनेवाले नगण्य। खरीदने की यही आतुरता उस शेयर को चढ़ाती जाती है। दीर्घकालिक निवेश के लिए यह तरीका घातक है। लेकिन ट्रेडिंग में ब्रेकआउट एक सही मंत्र है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

किसी शेयर के काफी गिरने पर हम सोचते हैं कि अब ज्यादा नहीं गिरेगा। हमारे जैसे रिटेल ट्रेडरों की खरीद पर वो बढ़ने लगे तो हम फटाफट खरीद डालते हैं। कंपनी फंडामेंटली मजबूत है तो यह समझदारी भरा निवेश हो सकता है। लेकिन ट्रेडिंग के लिए घातक है क्योंकि हर बढ़त पर ऊपरी भाव के पिछले खरीदार उसे बेचने लगते हैं तो बार-बार गिरता रहता है। मजबूरन हमें लॉन्ग-टर्म निवेशक बनना पड़ता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बड़े से बड़ा जानकार भी नहीं जानता कि किसी स्टॉक का सटीक टॉप और बॉटम कहां होगा। इसलिए यह मान लेना या अपेक्षा करना खुद को धोखे में रखने जैसा है कि हम या आप ऐसा कोई टॉप व बॉटम पकड़ लेंगे। हम अधिक से अधिक इतना कर सकते हैं कि टेक्निकल संकेतकों वगैरह का इस्तेमाल करते हुए 5-10% की ऐसी रेंज चिन्हित कर लें, जिसकी प्रायिकता ज्यादा और रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात अनुकूल हो। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग अनिश्चितता से दूर भागने नहीं, बल्कि उससे खेलने का बिजनेस है। यकीनन इस समय विदेश से लेकर देश तक में अनिश्चितता का आलम है। कच्चे तेल के दाम, रुपए की विनिमय दर और चालू व राजकोषीय घाटे समेत सारी अर्थव्यवस्था के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। सरकारी दावों पर यकीन करने में खतरा है क्योंकि उसके मंत्रियों का झूठ बोलना अपवाद नहीं, नियम है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

डॉलर के मुकाबले रुपया इस साल जनवरी से अब तक 7.4% गिर चुका है। पिछले एक महीने में यह गिरावट कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। उसको संभालने के लिए रिजर्व बैंक को बाज़ार में बराबर डॉलर झोंकने पड़ रहे हैं। इससे हमारा विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घटता जा रहा है। 13 अप्रैल-2018 से 18 मई-2018 के बीच यह 11 अरब डॉलर (75,086 करोड़ रुपए घट चुका है। यह गंभीर चिंता की बात है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

नवंबर 2016 में लगी नोटबंदी की मार से छोटे व मझोले उद्योग अभी तक उबर नहीं पाए हैं। फिर, जुलाई 2017 के बाद जीएसटी के खराब अमल ने निर्यातकों को निचोड़ दिया। वे सरकारी नौकरशाही को संतुष्ट नहीं पा रहे कि उन्होंने निर्यात का शिपमेंट कर दिया है तो उनका टैक्स रिफंड अटका पड़ा है। यह रकम करीब 10,000 करोड़ रुपए है और इतनी कार्यशील पूंजी छोटे निर्यातक आसानी से जुटा नहीं पाते। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

मुद्रा कमज़ोर होने पर देश का निर्यात बढ़ जाता है। लेकिन अपने यहां ऐसा नहीं हो रहा। हमारा निर्यात अप्रैल-2018 में 5.1% बढ़ा है। मगर, मार्च-2018 में खत्म वित्त वर्ष में कुल निर्यात 303 अरब डॉलर हुआ, जो साल भर पहले से ज्यादा होने के बावजूद वित्त वर्ष 2013-14 के 310 अरब डॉलर के निर्यात से कम है। ऐसा तब, जब इस दौरान विश्व अर्थव्यवस्था सुधर गई और हमारा जीडीपी भी बढ़ा है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

रुपए के कमज़ोर और कच्चे तेल के महंगा होते जाने से देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत नकारात्मक असर पड़ेगा। कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ता जाएगा। देश से ज्यादा डॉलर निकलेंगे। नतीजतन चालू खाते का घाटा बढ़ता जाएगा। सरकार को ज्यादा ऋण उठाना पड़ेगा तो देश का राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा। महंगाई भी बढ़ेगी तो रिजर्व बैंक किसी भी सूरत में ब्याज दर नहीं घटा पाएगा। ऊपर से साल भर बाद चुनाव हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

रुपए की कमज़ोरी से समान आयात के लिए हमें ज्यादा डॉलर चुकाने होंगे। भारत अपनी 83% तेल ज़रूरत आयात से पूरी करता है। लेकिन कच्चे तेल का अंतरराष्ट्रीय दाम बढ़ते-बढ़ते 80 डॉलर/बैरल को पार कर चुका है। यह बीते चार साल का उच्चतम स्तर है। मई 2014 से जनवरी 2016 के बीच कच्चे तेल के दाम 74% लुढ़क गए थे तब प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अपनी किस्मत कहा था। लेकिन आगे संकट है! अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी