घर-परिवार व समाज से मिली मान्यताएं ट्रेडरों की सोच से लेकर कर्म तक को बांध देती हैं। वे न मुक्त रूप से विश्लेषण कर पाते हैं और न ही सही तस्वीर देख पाते हैं। खुद को नुकसान पहुंचाने के कदम उठाते हैं। वे इससे निकलने के लिए किताबें बढ़ते हैं, अभ्यास करते है, खुद से बार-बार वादा करते हैं कि आगे से गलती नहीं करेंगे। लेकिन पुरानी मान्यताएं उन्हें पटकती रहती है। अब सोम का व्योम…और भीऔर भी

बचपन से बनती मान्यताओं व धारणाओं से हमारी आंतरिक मनोवैज्ञानिक संरचना तैयार होती है। वही हमारे हर व्यवहार को नियंत्रित करती है। मन में गांठ है कि कभी हारना नहीं है तो ट्रेडर पहले से तय स्टॉप-लॉस खिसका जाता है। उसका रिस्क बढ़ता जाता है। फिर भी हार मानना उसे गवारा नहीं क्योंकि ऐसा करने से वो गलत साबित हो जाएगा। लेकिन हमेशा जीतने की मान्यता अंततः उसे घाटे में डुबा डालती है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

हमारी मान्यताएं आमतौर पर अतार्किक व नकारात्मक होती हैं। वे तथ्यों से मेल नहीं खातीं। फिर भी हम उनसे चुम्बक की तरह चिपके रहते हैं क्योंकि वे हमारे अवचेतन मन में गहरी पैठ बना चुकी होती हैं। हमारा सचेतन मन कितनी भी कोशिश कर ले, फैसला लेते वक्त अवचेतन मन ही निर्णायक साबित होता है। हम खूब सारी किताबें पढ़ते हैं, नए-नए लेख पढ़ते हैं। लेकिन मौका पड़ने पर कुछ काम नहीं आता। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हम अपनी मान्यताओं के प्रतिकूल पड़नेवाले अनुभवों को ठुकराते और अनुकूल पड़नेवाले अनुभवों को स्वीकार करते जाते हैं। धीरे-धीरे मान्यताएं हमारी ऐसी प्रोग्रामिंग व कंडीशनिंग कर देती हैं कि हम दुनिया को खुली आंखों से देखने के बावजूद उन्हें मान्यताओं की नज़र से समझने लगते हैं। सच्चाई दूर खड़ी हमारा मुंह चिढ़ाती रहती है और हम समझ ही नहीं पाते कि हम हर काम में बराबर नाकाम क्यों होते जा रहे हैं। अब आजमाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

पांच-छह साल की उम्र तक हमारे आग्रह या मान्यताएं आकार लेना शुरू हो जाती हैं। वे सामाजिक परिवेश से निकलती हैं और उन्हीं को पुष्ट करती हैं। होना तो यह चाहिए था कि शिक्षा व्यवस्था उन्हें हर पल चुनौती देती और सोचने की वैज्ञानिक, तर्कसंगत व वस्तुगत पद्धति विकसित करती। लेकिन अंग्रेज़ों ने भारतीयों की सृजन क्षमता को कुंद करने के लिए जो शिक्षा प्रणाली शुरू की, वही कमोबेश अब भी जारी है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

मान्यताएं हमारे जीवन के हर पहलू में दखल देती हैं रिश्तों व स्वास्थ्य से लेकर बिजनेस, फाइनेंस व ट्रेडिंग तक में। मान्यताएं ऐसे सीधे-सरल विचार हैं जिन्हें हम आंख मूंदकर सच मान लेते हैं। हमें उन पर कोई भी एतराज़ बर्दाश्त नहीं होता, खासकर जब उनका सीधा ताल्लुक हम से हो। मान्यताओं की बुनियाद हमारे महसूस करने की शुरुआत से ही बनने लग जाती है। तभी से बनने लग जाते हैं हमारे आग्रह-पूर्वाग्रह। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

शेयरों के भाव कंपनी के फंडामेंटल्स नहीं, बल्कि उसके फंडामेंटल्स के प्रति लोगों के नज़रिए के आधार पर बदलते हैं। वहीं, शेयर के भावों में कंपनी के प्रति लोगों का नजरिया झलकता है। अगर सकारात्मक नज़रिया है तो वे उसे खरीदते हैं। इस तरह बहुत सारे लोगों के खरीदने से स्टॉक के भाव चढ़ते जाते हैं। नकारात्मक नज़रिया है तो लोगबाग स्टॉक को बेचने लगते हैं तो उसके भाव गिरते चले जाते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कंपनी के फंडामेंटल मजबूत हुए तो सूचकांक से निकलने के बाद स्टॉक जल्दी ही पलटकर बढ़ने लगता है। मसलन, जून 2015 से जून 2017 के बीच सेंसेक्स से टाटा पावर, वेदांता, हिंडाल्को, भेल और गैल इंडिया को निकाला गया था। तब से इनके शेयरों के भाव क्रमशः 22%, 266%, 225%, 11% और 32% बढ़ चुके हैं। वहीं, सूचकांकों में शामिल किए गए स्टॉक्स के भाव ट्रेडरों की दिलचस्पी बढ़ने से चढ़ने लगते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

आमतौर पर शेयर बाज़ार के प्रमुख सूचकांकों से ऐसे स्टॉक्स को बाहर किया जाता है जो काफी गिर चुके हैं, इतने ज्यादा कि उनमें और ज्यादा गिरने की गुंजाइश काफी कम होती है। होता यह है कि सूचकांक से निकाले जाने के बाद ऐसे स्टॉक्स सदमे में तात्कालिक रूप से गिर जाते हैं क्योंकि सूचकांक से जुड़े ईटीएफ और म्यूचुअल फंडों को एडजस्ट करने के लिए उन्हें बेचकर नए स्टॉक्स खरीदने होते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सूचकांक के घटकों में बदलाव के लिए बाज़ार पूंजीकरण से लेकर लिक्विडिटी जैसे तमाम मानक बनाए गए हैं। लेकिन हम स्टॉक्स को निकालने या लाने की रणनीति को गहराई से परखें तो स्पष्ट हो जाता है कि निर्धारित मानकों पर ठीक से अमल नहीं किया जाता। अमूमन सूचकांक में ऐसे स्टॉक्स लाए जाते हैं जो पहले से ही काफी चढ़ चुके होते हैं और उनमें ज्यादा बढ़ने की गुंजाइश बहुत कम होती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी