हम शेयर बाज़ार में इसीलिए गच्चा खाते हैं क्योंकि जो हमारे वश में है, उन्हीं पर ध्यान न देकर हम अनाप-शनाप बातों पर शक्ति और समय बरबाद करते हैं। पूछते और चैनलों पर देखते फिरते हैं कि बाज़ार आगे कहां जाएगा। यह फालतू सवाल है। इसका सही जवाब मिलना भी असंभव है। हां, इतिहास गवाह है कि जबरदस्त उठापटक के बावजूद शेयर लंबे समय में वित्तीय बाज़ार में सबसे ज्यादा रिटर्न देते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार निकट-भविष्य में कहां जाकर किधर थमेगा, यह हम-आप ही नहीं, कोई बड़े से बड़ा विद्वान या बाज़ार का उस्ताद भी नहीं बता सकता। शेयर बाजार पर फिलहाल जो साढ़े-साती लगी है, उन अनिश्चितताओं का भी हम कुछ बना-बिगाड़ नहीं सकते। इन पर हमारा कोई वश नहीं। लेकिन दो बातें हमारे वश में हैं। एक, हम किसी शेयर का कितना भाव लगाते हैं। दो, हम बाजार के उतार-चढ़ाव को कैसे लेते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार ऐसे कारणों से गिरता जा रहा है जो हमारे हाथ से बाहर हैं। जिस साढ़े-साती का जिक्र हमने किया, उसकी साढ़े सात अनिश्चितताएं रातों-रात नहीं खत्म होने जा रहीं। बाज़ार का गिरना कतई थम नहीं रहा। एक दिन पटरी पर आता दिखा बाज़ार अगले ही दिन पटरी से उतर जाता है। उसे रोकना हमारे वश में नहीं। लेकिन कुछ चीजें हमारे वश हैं जिन पर ज्यादा ध्यान देकर हम कमा सकते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जून तिमाही में जीडीपी 8.2% बढ़ गया। कंपनियों के नतीजे भी बेहतर आने लगे। पर देशी व विदेशी संस्थाओं की खींचतान, एलआईसी पर बढ़े बोझ, आईएल एंड एफएस के संकट, राजनीतिक दुविधा, कमज़ोर रुपए, महंगे कच्चे तेल और बढ़ती ब्याज दरों ने सब पटरा कर दिया। बाज़ार गिर गया। फिर भी सेंसेक्स 22.33 और निफ्टी 25.30 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है तो गिरने के बाद भी अभी महंगा है बाज़ार। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

ग्लोबल बनी दुनिया का दुष्प्रभाव है कि अमेरिका और चीन के व्यापार-युद्ध का प्रभाव भारत समेत सभी देशों पर पड़ता है। यह हमारे शेयर बाज़ार पर लगी साढ़े-साती का एक प्रमुख तत्व है। इस साल मार्च से ट्रम्प ने इसका बिगुल बजाया और अब दोनों देश एक दूसरे के उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने में लगे हुए हैं। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा आयातक है तो उसका शुल्क बढ़ाना ज्यादा ही मारक होता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय बाज़ार से निवेश निकाल भागते जा रहे हैं। इससे भारतीय रुपया कमज़ोर पड़ता गया और डॉलर 75 रुपए के करीब जा पहुंचा। उधर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ते जा रहे हैं। भारत अपनी ज़रूरत का 83% कच्चा तेल आयात करता है तो उसे खरीदने के लिए डॉलर की मांग बढ़ती गई जिससे रुपया और ज्यादा कमज़ोर होता जा रहा है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने भले ही शुक्रवार को रेपो व रिवर्स रेपो दर को 6.50% और 6.25% पर अपरिवर्तित रखा। लेकिन भारत से लेकर अमेरिका तक में ब्याज दरें बढ़ रही हैं। अपने यहां सरकारी बांडों पर यील्ड की दर 8-8.5% चल रही है, जबकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अभी हाल में पिछले तीन सालों में आठवी बार ब्याज दर बढ़ाकर 2-2.25% कर दी और आगे चार बार फिर बढ़ाने का संकेत दे दिया। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

देशी-विदेशी संस्थाओ की खींचतान, एलआईसी पर बढ़ता बोझ और सिस्टम में नकदी के संकट की आशंका। ये हुए ढाई कारक, जिन्होंने इस वक्त भारतीय शेयर बाज़ार को मथ रखा है। ज्योतिष की भाषा में इस ढय्या कह सकते हैं। साढ़े साती में से ढाई कारक निकल गए तो बाकी बचे पांच कारक। कारक नहीं, बल्कि इन्हें अनिश्चितता कहा जाना चाहिए। पहली अनिश्चितता यह है कि आठ महीने बाद मोदी सरकार रहेगी या नहीं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

इंफ्रास्ट्रक्चर व हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों ने कमर्शियल पेपर जैसे ऋण-प्रपत्रों में हाल में जिस तरह डिफॉल्ट किया, उससे डर लगा कि कहीं सिस्टम में नकदी का संकट न पैदा हो जाए। बैंकों के बढ़ते एनपीए का संकट पहले से था। सरकार एलआईसी पर आईडीबीआई बैंक का बोझ डाल चुकी है। वैसे, आईएल एंड एफएस में सत्यम की तरह नया निदेशक बोर्ड बना दिया गया है। पर, एलआईसी को ही उसका उद्धार करना होगा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में ज्वार-भाटे जैसे स्थिति है। निफ्टी 150 से 200 अंकों का उतार-चढ़ाव झेल रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि जहां विदेशी निवेशक संस्थाएं बराबर बेच रही हैं, वहीं म्यूचुएल फंड व बीमा कंपनियों जैसी देशी निवेशक संस्थाएं बराबर खरीद रही है। इनके बीच का असंतुलन बाजार में असामान्य हलचल का सबब बन जा रहा है। ऊपर से आईएल एंड एफएस जैसी कंपनियों के डिफॉल्ट ने परेशानी बढ़ा रखी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी