शेयर बाज़ार का रुख हज़ारों-लाखों की भीड़ नहीं, बल्कि मुठ्ठीभर लोग तय करते हैं। किसी भी बिजनेस की तरह यहां भी 80% लोग पीछे-पीछे चलते हैं, जबकि 20% लोग दिशा तय करते हैं। कौन हैं ये लोग? ये लोग वे नहीं जो टेलिविज़न चैनलों के स्टूडियो में बैठकर बाज़ार का भविष्य बांच रहे होते हैं। इन तथाकथित विशेषज्ञों की हैसियत स्टेशनों या फुटपाथ पर हाथ की रेखाएं बांचते पंडितों से ज्यादा नहीं होती। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में रिटेल ट्रेडरों या निवेशकों के आने का असर उतना ही होता है, जितना किसी तालाब में एक बाल्टी पानी का। यहां सारा खेल होता है संस्थाओं का। इसमें देशी (डीआईआई) और विदेशी निवेशक संस्थाएं (एफआईआई) शामिल हैं। बैंकों व ब्रोकरों के प्रॉपराइटरी निवेश की भी अहमियत है। हमें खासतौर पर एफआईआई के शुद्ध निवेश पर नज़र रखनी चाहिए क्योंकि वो बाज़ार की दिशा तय करने में अहम रोल निभाता है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग छोटी अवधि का बिजनेस/खेल है। इसमें लंबे समय की फंडामेंटल एनालिसिस नहीं चलती। ट्रेडर के लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि सेंसेक्स या निफ्टी इस समय कितने पी/ई या पी/बी अनुपात पर ट्रेड हो रहे हैं। उसके लिए सबसे ज्यादा मतलब इस बात का होता है कि बाज़ार में धन का प्रवाह कितना और कैसा है? लोगबाग बाज़ार में धन लगा रहे हैं या वापस खींच रहे हैं? अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

क्या लगता है कि बाज़ार किधर जाएगा? मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आएगी या कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार बनेगी? दोनों ही सूरत में शेयर बाज़ार का क्या हाल रहेगा? बाज़ार चुनावों के बाद गिरेगा कि बढ़ेगा? गिरा तो कितना और बढ़ा तो कितना? इस साल भारत का डीजीपी कितना रह सकता है? ऐसे सवालों से आप भी रू-ब-रू होते होंगे। लेकिन ये तमाशबीनों के सवाल है, बाज़ार से कमानेवालों के नहीं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बीएसई सेंसेक्स 1 जनवरी 1980 से 31 दिसंबर 2018 के बीच 118 से 36,068 पर पहुंच गया। 39 सालों में 306 गुना। 15.8% सालाना चक्रवृद्धि दर। अर्थव्यवस्था से ज्यादा बढ़ा। पर अलग-अलग साल को देखें तो उसने गठबंधन सरकार में सबसे ज्यादा और सबसे कम रिटर्न दोनों दिए हैं। एकदलीय सरकार में भी यही हाल रहा। साफ है कि सरकार के स्वरूप और शेयर बाज़ार के रिटर्न में कोई सीधा रिश्ता नहीं है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

भारतीय अर्थव्यवस्था 1980 के बाद 39 सालों में अब तक बराबर बढ़ती रही है। अगर हम उसकी विकास दर से मुद्रास्फीति की दर न घटाए और उसे सम-मूल्य पर लें तो वह अगर 1980 में 100 रुपए की थी तो अब 11,000 रुपए की हो चुकी है। 110 गुनी वृद्धि, 12.8% की सालाना चक्रवृद्धि दर। इस दौरान बीएसई सेंसेक्स कितना बढ़ा है? क्या उसके रिटर्न का कोई रिश्ता सरकारों के स्वरूप से है? अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव का पहला चरण पूरा हो गया। इसमें बीस राज्यों की 91 सीटों पर वोट डाले गए। इस हफ्ते गुरुवार, 18 अप्रैल को दूसरे चरण का मतदान होना है। इसमें 13 राज्यों की 97 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। देश की धुकधुकी 23 मई को आनेवाले चुनाव नतीजों पर लगी हुई है। लेकिन जो भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित ताकत को जानते हैं, उन्हें पता है कि उसका बढ़ना नहीं रुकेगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल ताकत उसका घरेलू बाज़ार और खपत है। यह बाज़ार इतना बड़ा है कि भारत को कहीं बाहर झांकने की ज़रूरत नहीं। इसलिए सही मायने में कहें तो भले ही दुनिया ग्लोबल हो गई हो और माल व सेवाओं के आयात-निर्यात की खास भूमिका हो, भारतीय लोग बाहर और बाहर के लोग यहां बेधड़क आते जा रहे हों, लेकिन भारत की सेहत पर विश्व अर्थव्यवस्था का खास फर्क नहीं पड़ता। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सवाल उठता है कि आर्थिक विकास को गति देने के मामले में गठबंधन की सरकारें आखिर एकदलीय सरकारों से बेहतर काम क्यों करती हैं? इसका एक कारण यह हो सकता है कि एकदलीय सरकार को अपनी सत्ता का दंभ होता है। इसलिए वो मुठ्ठी भर नेताओं के दिमाग या सत्ता समीकरण को साधने की नीयत से मनमर्जी से नीतियां थोपती हैं, जबकि गठबंधन सरकारों को मजबूरी में सबको साथ लेकर चलना पड़ता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

मोदीराज में आर्थिक विकास दर का 39 सालों की औसत दर से कम रहना साबित करता है कि एकदलीय सरकारों की उपलब्धि गठबंधन सरकारों से खराब रही है। हम पाते हैं कि केंद्र में 1980 के बाद चार में से चार एकदलीय सरकारों का प्रदर्शन कमतर रहा, जबकि छह में से तीन गठबंधन सरकारों ने 6.3% सालाना के दीर्घकालिक औसत से बेहतर प्रदर्शन किया है। इतिहास का यह सबक हमें याद रखना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी