दुनिया में कोरोना वायरस का कहर जारी है। लेकिन क्या वित्तीय बाज़ारों से उसका काला साया अब उठ गया है? क्या उसे जितनी उथल-पुथल मचानी थी, वह अब बीत चुकी है? यह सवाल इस समय हर तरफ पूछा जाने लगा है। वैसे, इस हकीकत से इनकार नहीं कि शेयर बाज़ार में डर का कोप इस समय ग्यारह साल के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा हुआ है। उसने सामान्य स्तर तक आने में वक्त लगेगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोना वायरस को सर्वव्यापी महामारी घोषित कर दिया है। दुनिया का कोई भी देश इसकी चपेट में आने से नहीं बचा है। जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने तो यहां तक कह दिया है कि जर्मनी में रह रहे 70% लोग इसके शिकार हो सकते हैं। भारत में भी इसके मामले दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। इस महामारी का डर समूची विश्व अर्थव्यवस्था पर कहर बनकर बरपा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था अगर 1991 जैसी हालत में पहुंच गई है तो यह बुरी खबर के साथ अच्छी खबर भी है क्योंकि देश ने संकट से उबरने के लिए आर्थिक सुधारों का दौर तभी शुरू किया था। इसलिए प्रचंड बहुमत वाली मोदी सरकार चाहे तो मुख्य़तः विदेशी माल व पूंजी को छूट देनेवाले आर्थिक सुधारों के दायरे से बाहर निकल अब घरेलू बाज़ार पर केंद्रित कर सकती है और विकास को गति दे सकती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…और भीऔर भी

ठीक उस वक्त, जब लग रहा था कि हमारी अर्थव्यवस्था बुरे दिनों को पीछे छोड़कर नया उभार पकड़ने जा रही है, तभी कोरोना वायरस के विश्वव्यापी प्रकोप ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उसकी हालत अब चाकू की धार पर चलने जैसी हो गई है। ज़रा-सा चूके तो सीधे गहरी घाटी में। कुछ आलोचक तो यहां तक कहने लगे हैं कि अर्थव्यवस्था की हालत 1991 के आर्थिक संकट जैसी हो गई है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

कोरोना वायरस का कहर थम नहीं रहा। ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार इससे दुनिया में 1.5 करोड़ लोगों की मौत हो सकती है और विश्व अर्थव्यवस्था को 2.4 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। इसकी सर्वाधिक मार  चीन के बाद भारत को लग सकती है। होली के मौके पर यह आशंका रंग में भंग न डाल सके, यही शुभकामना है। लेकिन सच का सामना तो करना ही पड़ेगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

ध्यान रखें कि जब भी बड़ी घटना, खबरों या काफी उथल-पुथल का दिन होता है, तब वित्तीय बाज़ार में रिस्क या अनिश्चितता बहुत बढ़ जाती है। संभव है सब शांति से निपट जाए। लेकिन चूंकि उस दिन अनिश्चितता बढ़ी होती है, इसलिए रिटेल ट्रेडर को बाज़ार से दूर रहने के फैसले पर अडिग रहना चाहिए। इसलिए मौद्रिक नीति, कंपनियों के नतीजों, बजट या डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी के दिन ट्रेडिंग नहीं करनी चाहिए। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

रिटेल ट्रेडर के लिए सबसे सुरक्षित तरीका है लॉन्ग या खरीदने के सौदे करना। यहीं न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न के अवसर मिलते हैं। लेकिन कभी-कभी घबराहट भरी बिकवाली का ऐसा दौर आता है, जो काफी लम्बा खिंच सकता है, जब लॉन्ग ट्रेड के कमाई के अवसर बहुत कम होते हैं। ऐसे दौर में ट्रेडर को रोजमर्रा के बाज़ार से हटकर दो-चार महीने से लेकर चार-पांच साल तक का निवेशक बन जाना चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

इस हकीकत से इनकार नहीं कि वित्तीय बाजार में गिरने के वक्त जमकर कमाया जा सकता है। बहुतेरे ट्रेडर हैं जिन्होंने शॉर्ट-सेलिंग से करोड़ों कमाए हैं और अब भी कमा रहे हैं। लेकिन यह शॉर्ट-सेलिंग डेरिवेटिव सौदों में ही संभव है जिसके लिए काफी पूंजी चाहिए। इतनी कि चार-पांच लाख डूब जाएं तो कोई फर्क न पड़े। इतना भारी रिस्क जमकर रिटर्न देता है। लेकिन क्या रिटेल ट्रे़डर इतना जोखिम उठा सकता है? अब बुधवार की बुद्धि…और भीऔर भी

रिटेल ट्रेडर ज्यादा रिस्क नहीं ले सकता। उसके पास सीमित पूंजी होती है जो अगर डूब गई तो रिस्क छोड़िए, वह ट्रेडिंग ही नहीं कर सकता। उसे दो सार्वकालिक नियमों का पालन करना होता है। पहला नियम, हमेशा अपनी पूंजी को सुरक्षित रखना और दूसरा नियम, हमेशा पहले नियम को याद रखना। इस समय शेयर बाज़ार में रिस्क अपने अधिकतम स्तर पर पहुंचा हुआ है तो न्यूनतम रिस्क की कोई गुंजाइश ही नहीं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में कोई सनसनी का आनंद लेने नहीं, कमाने आता है। संस्थाओं के पास रिस्क प्रबंधन का पूरा सिस्टम, बैक-एन्ड होता है। लेकिन रिटेल ट्रेडर को खुद ही इस सिस्टम का भी इंतज़़ाम करना होता है। वह बाज़ार के उतार-चढ़ाव के आनंद में सराबोर होना कतई गवारा नहीं कर सकता है। उसका स्पष्ट मकसद होना चाहिए, न्यूनतम रिस्क में अधिकतम कमाना। उसकी मजबूरी है कि वह ज्यादा रिस्क ले ही नहीं सकता। अब सोम का व्योम…औरऔर भी