बाज़ार का गिरना लंबे समय के निवेशकों के लिए अक्सर अच्छा होता है क्योंकि इस दौरान तमाम मजबूत कंपनियों के शेयर भी गिर जाते हैं। ऐसे मौके पर इन्हें पकड़ लेना मुनाफे का सौदा साबित होता है। आज हम तथास्तु में ऐसी कंपनी पेश कर रहे हैं, मजबूती के बावजूद जिसके शेयर गिरकर इधर अपने अंतर्निहित मूल्य के काफी करीब पहुंच गए हैं। इसमें अभी निवेश करना तीन साल में 35% से ज्यादा रिटर्न दे सकता है।औरऔर भी

बाज़ार में हर गिरा हुआ शेयर सस्ता नहीं होता। लेकिन बिजनेस मॉडल संभावनामय हो तो किन्हीं वजहों से गिरावट से सस्ता हुआ शेयर कंपनी में निवेश करने का अच्छा मौका देता है। आज हम तथास्तु में एक ऐसी ही कंपनी पेश कर रहे हैं जिसके शेयर इधर बाज़ार में गिरे हुए हैं। कंपनी को अपने कुछ हालिया फैसलों से घाटा उठाना पड़ा है। लेकिन अगले दो-तीन सालों में इसमें किया गया निवेश अच्छा रिटर्न दे सकता है।औरऔर भी

खेती-किसानी का ज़माना लद गया। अब उद्योग-धंधे का ज़माना है। कृषि में भी बढ़ना है तो उसे घर की नहीं, उद्योग व समाज की खपत से जोड़ना पड़ेगा। खेती में परिवार की जायदाद अमूमन परिवार को ही मिलती थी। वहीं उद्योग में, खासकर लिस्टेड कंपनियों का स्वामित्व खुला है। कंपनी जम जाए तो कोई भी उसके मालिकाने में ‘शेयर’ खरीद सकता है। तथास्तु में हम ऐसी ही कंपनियां छांटने में मदद करते हैं। अब आज की कंपनी…औरऔर भी

पोर्टफोलियो प्रबंधन का सिद्धांत कहता है कि अगर अगल-अलग तरह की 40 कंपनियों में निवेश किया जाए तो पूरे निवेश में कंपनियों का खास अपना रिस्क मिट जाता है और केवल शेयर बाज़ार का आम रिस्क बचा रह जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आम निवेशकों को एक समय में कितनी कंपनियों में निवेश रखना चाहिए। व्यवहार कहता है कि इनकी संख्या 15 से 40 रहे तो बेहतर है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

निवेश में ज्यादा हायतौबा नहीं मचानी चाहिए। साल भर में 15-20% रिटर्न काफी है। इससे ज्यादा मिल जाए तो अच्छा। लेकिन शुरू में ही निवेश को कई गुना करने का लालच न पालें। अन्यथा शातिर खिलाड़ी इसका फायदा उठा आपकी जेब चट कर जाएंगे। चक्रवृद्धि की ताकत समझिए। 15% सालाना की चक्रवृद्धि की दर से बढ़े तो धन पांच साल में दोगुना हो जाता है। अब तथास्तु में आज की कंपनी जिसका शेयर लुढ़का पड़ा है।…और भीऔर भी

किसी कंपनी में निवेश बनाए रखना या निकालना मजबूरी में नहीं, हमारी मर्जी से तय होना चाहिए। कभी-कभी सब कुछ देखभाल कर खरीदने के बावजूद किसी वजह से कंपनी के शेयर गिरने लगते हैं। मगर हम घाटा खाने से घबराते हैं और उससे अरसे तक इस उम्मीद में चिपके रहते हैं कि हो सकता है पलट जाए। समझदारी इसमें है कि खरीद मूल्य से 25% गिरते ही हमें उससे बेझिझक निकल लेना चाहिए। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

शेयर बाज़ार इस साल मार्च के बाद से लगभग 15% गिर चुका है तो बिजनेस चैनलों व अखबारों में विश्लेषक बताने लगे हैं कि अब ब्लूचिप कंपनियों को खरीद लेना चाहिए। लेकिन कौन-सी ब्लूचिप? हो सकता है कि गिरी हुई ब्लूचिप सड़ी हुई निकली। जैसे, किसी ज़माने की ब्लूचिप रिलायंस कैपिटल 2008 में 79% गिरने के बाद 36% और गिर चुकी है। तब 92% गिरा यूनिटेक 85% और गिर चुका है। आज पेश है एक सॉलिड ब्लूचिप…औरऔर भी

अभी दुनिया की जो आर्थिक हालत है, चीन तक की स्थिति डांवाडोल है, उसे देखते हुए क्या भारत में अब भी दीर्घकालिक निवेशकों के लिए कोई संभावना बची है? यह विषय निबंध के लिए अच्छा है। लेकिन हम जैसे आम निवेशकों के लिए इसका कोई मायने-मतलब नहीं। इसे संस्थाओं की मगजमारी के लिए छोड़ देना चाहिए। हमें तो अच्छी कंपनी को सही भाव पर पकड़ने की कोशिश में लगे रहना चाहिए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

यह कंपनी नोट नहीं छापती, बैंक भी नहीं है। लेकिन कैश इसकी ताकत है। खास कमोडिटी के धंधे से जुड़ी है। लेकिन जिंसों के अंतरराष्ट्रीय भाव 16 साल की तलहटी पर हैं, चीन की आर्थिक सुस्ती से समूची दुनिया त्रस्त है, डंपिंग का मंडराता खतरा है, तब भी इससे कंपनी की सेहत पर कोई फर्क नहीं। फिर, सरकारी कंपनी होने के बावजूद इसने शेयरधारकों की दौलत घटाई नहीं, बढ़ाई है। तथास्तु में आज इसी कंपनी का दमखम…औरऔर भी

कोयल कभी घोंसला नहीं बनाती। वो बड़ी चालाकी से अपने अंडे कौए के घोंसले में डाल देती है। शेयर बाज़ार में निवेश करना ऐसा ही है। बस ‘कौए’ की सही पहचान होनी चाहिए। ऐसा न हो कि वो आपका ‘अंडा’ ही खा जाए। बुरी कंपनियां निवेशकों की दौलत खा जाती हैं, जबकि अच्छी कंपनियां शेयरधारकों की दौलत बराबर बढ़ाती जाती हैं। आज तथास्तु में ऐसी कंपनी जिसने 37 सालों में दिया है 21% का सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न…औरऔर भी