शेयर बाजार के बारे में सूक्तियों की कोई कमी नहीं। कहते हैं कि आप आजीविका के लिए जो करते हैं, उससे आय हासिल कर सकतें है, लेकिन दौलत इक्विटी या शेयरों में निवेश से बनाई जाती है। सफलतम निवेशक वॉरेन बफेट का मशहूर कथन है, “किताबी ज्ञान से महान निवेशक बनते तो सारे के सारे लाइब्रेरियन आज खूब अमीर होते।” निवेश करना सरल है। न किताबी ज्ञान, न कोई भारी-भरकम डिग्री। कोई भी डिमैट एकाउंट खोलकर निवेशऔरऔर भी

कंपनी का बिजनेस भी बम-बम कर रहा हो और शेयर के भाव भी दबे हुए हों – ऐसी आदर्श स्थिति बहुत कम आती है। आमतौर पर शानदार बिजनेस कर रही कंपनी के शेयर सस्ते नहीं मिलते, जबकि डूबते शेयर भावों वाली कंपनियों के बिजनेस में दमखम नहीं होता। कारण यह है कि शेयर बाज़ार में निवेश को आतुर लोग कम से कम लाखों में हैं और अधिकांश लोगों के पास इफरात धन के साथ-साथ थोड़ी-बहुत पारखी नज़रऔरऔर भी

कंपनी कितनी भी अच्छी हो, बिजनेस मॉडल कितना भी जानदार हो, लेकिन उसके शेयर को किसी भी भाव पर खरीद लेना सही नहीं होता। मसलन, जुबिलैंट फूडवर्क्स का धंधा जमा-जमाया है। एवेन्यू सुपरमार्ट्स (डी-मार्ट) का भी बिजनेस मॉडल जबरदस्त है। लेकिन जब निफ्टी 24.75 और सेंसेक्स 28.48 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है, तब जुबिलैंट फूडवर्क्स का शेयर 118.40 और डी-मार्ट का शेयर 223.04 के पी/ई अनुपात पर खरीदना नादानी ही नहीं, पागलपन है। शेयरऔरऔर भी

हर साल, नया साल। नहीं पता कि अगले 365 दिनों में क्या होगा। अज्ञात में छलांग। समय की धार है, प्रवाह है जिसमें हर किसी को बहना है। लेकिन अज्ञान नहीं होना चाहिए। नहीं तो अज्ञात आपको चकरघिन्नी बना सकता है। वहीं, अगर ज्ञान और हौसला हो तो कामयाबी के दरवाजे खुलते चले जाते हैं। शेयर बाज़ार इसी अज्ञात में छलांग लगाने जैसा काम है। जो ज्ञान से, समझदारी से, अपनी सीमाओं को समझते हुए रिस्क उठातेऔरऔर भी

विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से निकल रहे हैं। उनके निकलने से सिस्टम में डॉलर घट गए तो डॉलर का भाव रुपए में बढ़ गया। दिसंबर तिमाही में विदेशी निवेशकों ने 4.2 अबर डॉलर यहां से निकाले हैं। इससे हमारा रुपया 1.9% खोखला हो गया। समूचे एशिया में सबसे ज्यादा मार रुपए पर पड़ी है। विदेशियों के इस तरह निकलने से बीएसई सेंसेक्स 19 अक्टूबर के शिखर से 10% से ज्यादा गिरने के बाद अब जाकर थोड़ाऔरऔर भी

जिन कंपनियों ने अभी तक मुनाफा कमाने का माद्दा न दिखाया हो, उनमें इस भरोसे निवेश करने का कोई मतलब नहीं कि वे भविष्य में जमकर मुनाफा कमा लेंगी। हेज़ फंड ही इस तरह का जोखिम उठा सकते हैं, मध्यवर्ग से आनेवाले साधारण निवेशक नहीं। उन्हें तो अपनी बचत को बढ़ाने के लिए बहुत संभल-संभल कर चलना होता है। इसलिए हमेशा बचत का लगभग आधा हिस्सा एफडी और पीपीएफ जैसे सुरक्षित माध्यमों में लगाते रहना चाहिए। म्यूचुअलऔरऔर भी

सारा ब्रह्माण्ड, दुनिया, ज़माना और हमारे इर्द-गिर्द अंदर-बाहर की हर चीज़ हल पल बराबर बदलती रहती है। पिछले दस सालों में तो ज़माना कुछ ज्यादा ही तेज़ी से बदला है। इसमें भी पिछले दो साल में तो कोरोना ने सारी दुनिया, हमारा समूचा जीवन ही बदल डाला। सबक यह है कि लम्बे समय का निवेश चुनते वक्त वैसे ही उद्योग की कंपनी चुनी जाए जिसमें समय के साथ चलने का दमखम हो। ऐसा न हो कि कैसेटऔरऔर भी

लम्बे निवेश के लिए शेयर बाज़ार से कंपनियों को चुनना बड़ी टेढ़ी खीर है। देखना पड़ता है कि कंपनी कर्ज में तो नहीं डूबी, उसके धंधे में बरक्कत की कितनी गुंजाइश है, प्रवर्तकों का मालिकाना कितना है आदि-इत्यादि। लेकिन हम केवल एक मापदंड पर कस लें तो कंपनी चुनना आसान हो जाता है। यह मापदंड है कि वह लगाई गई पूंजी पर कितना रिटर्न (RoCE) कमा रही है। देश में पूंजी की लागत जितनी हो. मतलब वास्तविकऔरऔर भी

शेयर बाज़ार अचानक जब धराशाई होने लगता है तब निवेश का वाजिब पोर्टफोलियो बनाने की अहमियत समझ में आती है। वैसे तो निफ्टी-50 और सेंसेक्स-30 भी क्रमशः 50 और 30 स्टॉक्स से मिलकर बना एक तरह का पोर्टफोलियो ही है। लेकिन इनका उठना-गिरना बाज़ार के उठने-गिरने का पर्याय है। इनके ज्यादा गिरने पर निवेश का पोर्टफोलियो ज्यादा न गिरे, ऐसी कंपनियों की टोकरी बनाना ही असली पोर्टफोलियो बनाना होता है। अमूमन 20-30 स्टॉक्स या कंपनियों की सूचीऔरऔर भी

हर बड़ी कंपनी अच्छी नहीं होती और हर छोटी कंपनी खराब नहीं होती। यह अलग बात है कि एफआईआई जैसे बड़े निवेशकों के लिए छोटी कंपनियां उस ‘मछली जल की रानी है’ की तरह होती हैं जिन्हें ‘हाथ लगाओ डर जाएगी, बाहर निकालो मर जाएगी।’ असल में इन कंपनियों की इक्विटी बेहद कम होती है जबकि एफआईआई की न्यूनतम खरीद भी अपेक्षाकृत बहुत बड़ी होती है। उनके घुसते ही ऐसी कंपनियों के शेयर चढ़ जाते और निकलतेऔरऔर भी