उलझे तार सुलझे
ज्ञान एक अनुभूति है जिसके आते ही दुनिया के सारे उलझे तार सुलझ जाते हैं। लेकिन इस तक पहुंचने का कोई शॉर्टकट नहीं है। आंख और दिमाग खोल कर ही इस तक पहुंचा जा सकता है। आंखें बंद कर कतई नहीं।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
ज्ञान एक अनुभूति है जिसके आते ही दुनिया के सारे उलझे तार सुलझ जाते हैं। लेकिन इस तक पहुंचने का कोई शॉर्टकट नहीं है। आंख और दिमाग खोल कर ही इस तक पहुंचा जा सकता है। आंखें बंद कर कतई नहीं।और भीऔर भी
औरों की भलाई में ही अपना भला है या अपने हित में ही सबका हित है? दोनों ही सोच अपने विलोम में बदल जाती हैं। इसका सबूत पहले समाजवाद के पतन और अब अमेरिका व यूरोप के संकट ने पेश कर दिया है।और भीऔर भी
हम मन ही मन तमाम टोटके करते रहते हैं। तंत्र, मंत्र, अंधविश्वास। सिक्का सीधा पड़ा तो जीतेंगे। फूल खिला तो काम हो जाएगा। ये सब कुछ और कुछ नहीं, अनिश्चितता को नाथने के हमारे मूल स्वभाव का हिस्सा हैं।और भीऔर भी
मन में कोई ख्याल तभी आता है जब बाहर के संसार में उसकी जरूरत बन रही होती है। ख्याल को हकीकत बनाने में सिर्फ हमारा नहीं, बाहरी संसार का भी हित है तो वह सहयोग भी करता है। भले ही हमें न दिखे।और भीऔर भी
किसी भी चीज का ऊपर से नीचे गिरना नियति है। लेकिन गुरुत्वाकर्षण जैसे नियमों को समझ जहाज बनाकर नीचे से ऊपर उड़ा देना इंसान की स्वतंत्रता है। यही है नियति की अधीनता और कर्म की प्रधानता।और भीऔर भी
लीक छोड़कर किसी नई राह पर अकेले चलने का फैसला कोई मुश्किल काम नहीं है। असली चुनौती उस राह पर समझदारी और दृढ़ता से चलते रहने की है। नहीं तो जिद के ठंडा पड़ते ही कदम वापस लौट जाते हैं।और भीऔर भी
कबीर की उलटबांसियों पहले आध्यात्म्य की अबूझ पहेलियां लगती थीं। अब दुनिया का असली सच लगती हैं। जैसे, गतिशीलता ही स्थाई है और जिसे हम स्थाई समझते हैं वो तो बराबर गतिशील है।और भीऔर भी
जो चीज जैसी लगती है, वैसी होती नहीं। आंखों के रेटिना पर तस्वीर उल्टी बनती है, दिमाग उसे सीधा करता है। इसी तरह सच समझने के लिए बुद्धि की जरूरत पड़ती है जो अध्ययन, अभ्यास और अनुभव से ही आती है।और भीऔर भी
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