महान अतीत हमारे पीछे है। संभावनामय भविष्य हमारे आगे है। इन दोनों के बीच की अटूट कड़ी हैं हम। अतीत के वारिस और भविष्य के ट्रस्टी। जरा सोचिए, हमारी पीढ़ी को कितनी बड़ी जिम्मेदारी निभानी है।और भीऔर भी

जब तक जीवित हैं, शरीर कभी ऑफ नहीं लेता, दिल दिमाग कभी ऑफ नहीं लेता। लेकिन हम हमेशा ऑफ के चक्कर में पड़े रहते हैं। मन काम से भागता है। यह काम जीवन की सहज धारा क्यों नहीं बन सकता?और भीऔर भी

ये सीलन भरी बास, ये घुटे-घुटे विचार अच्छे नहीं लगते। सारे खिड़की दरवाजे खोल दो। हवाओं को आने दो, सवालों को आने दो। हवाएं सफाई का सरंजाम साथ लेकर चलती हैं और सवाल हर घुटन का जवाब।और भीऔर भी

हम यूं तो जीते हैं जानवरों की ही ज़िंदगी। उन्हीं प्रवृत्तियों के चलते दुनिया में आगे बढ़ते हैं। बस, इतना है कि समाज ने कुछ कपड़े-लत्ते पहना रखे हैं। धर्म और नैतिकता ने भ्रम पाले रखने के कुछ बहाने दे रखे हैं।और भीऔर भी

ज्ञान और धन, दोनों ही बिना जोखिम उठाए नहीं मिलते। यह आज का नहीं, बल्कि शाश्वत सच है। संत कबीर भी कह चुके हैं कि जिन ढूंढा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठि; मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठि।और भीऔर भी

निर्वाण कहीं और नहीं, इसी दुनिया, इसी जीवन में मिलता है। यह सम्यक सोच, संतुलित चिंतन और मन की शांति की अवस्था है। दूसरों का कहा-सुना काम आता है, लेकिन सफर हमारा अकेले का ही होता है।और भीऔर भी

समूची सृष्टि में हर चीज की दो गतियां होती हैं। एक अपनी धुरी पर और एक बाहर। अलग-अलग, लेकिन परस्पर जुड़ी। जो इन दोनों गतियों को साध लेता है, वही सफल साधक और सांसारिक है।और भीऔर भी

जो सबसे अच्छा है, वह लोकप्रिय भी हो, जरूरी नहीं। कहते हैं जो सबसे ज्यादा दिखता है, वही सबसे ज्यादा बिकता है। लेकिन वह सर्वोत्तम तो नहीं होता। हमें तो सर्वोत्तम चाहिए, खोटा सिक्का नहीं।और भीऔर भी

भावनाओं की दुनिया कितनी निश्छल होती है! लेकिन दुनियावाले इन्हीं भावनाओं की तह में पैठकर हमें छलने का तर्क निकाल लेते हैं। और, ज़िंदगी  का कारोबार तो तर्क से चलता है बंधुवर, भावनाओं से नहीं।और भीऔर भी

काम से काम रखने से ही काम नहीं बनता। हमारे इर्द गिर्द, दुनिया-जहान में बहुत कुछ ऐसा घटित हो रहा होता है जो आज नहीं तो कल हम पर असर डालता है। अपनी ही खोल में मस्त रहने का जमाना नहीं है यह।और भीऔर भी