चलने के लिए पैर चाहिए और पैर हमेशा जोड़े में होते हैं। कम से कम दो और ज्यादा से ज्यादा कितने भी। एक पैर के जीव तो पेड़ बन जाते हैं। वो बढ़ते हैं और खिलते भी। लेकिन हमेशा औरों के रहमोकरम पर।और भीऔर भी

पहले सड़क ही बनती थी। अब स्काई-ओवर भी बनते हैं। पहले जमीन से मिलती थी सुरक्षा। अब अंतर-संबंधों का मकड़जाल सुरक्षा देता है। पहले सब कुछ मूर्त था। अब बहुत कुछ अमूर्त है। वाकई बदल गया है जमाना।और भीऔर भी

जब भी हम नया कुछ रचते हैं, रुके हुए सोते बहने लगते हैं, अंदर से ऐसी शक्तियां निकल आती हैं जिनका हमें आभास तक नहीं होता। इसलिए काम शुरू कर देना चाहिए, काबिलियत अपने-आप आ जाएगी।और भीऔर भी

उसे प्रकृति कहिए या भगवान, उसकी बनाई हर चीज अपूर्ण होती है, आदर्श नहीं। आदर्श तो इंसान ने अपनी प्रेरणा के लिए बनाए हैं। इसलिए इंसान की किसी भी रचना को यथार्थ का पैमाना मानना सही नहीं।और भीऔर भी

हम में से हर किसी में कोई न कोई जानवर छिपा बैठा है। वह सांप, गोजर, बिच्छू से लेकर ऊंट, शेर और हाथी भी हो सकता है। हम उसे पहचान लें, आत्मदर्शन कर लें तो इंसान बनना ज्यादा आसान हो जाता है।और भीऔर भी

व्यापक स्तर पर लोग क्या चाहते हैं और उनकी चाहत कैसे पूरी की जा सकती है, जब आप यह जान लेते हैं, तभी से आपका उद्यम आकार लेने लगता है। छोटे से लेकर बड़े उद्यमी का मूल मंत्र यही होता है।और भीऔर भी

फूलों की पंखुड़ियों से लेकर तितलियों के पंखों तक में पैटर्न है। अंदर-बाहर की इस दुनिया में ऐसा कुछ नहीं, जहां क्रमबद्धता न हो, दोहराव न हो। हमारे जीवन तक में एक पैटर्न चलता है जिसे पकड़ने की जरूरत है।और भीऔर भी

कामयाब लोगों के घनेरों विचार, जीवन की गुत्थियों को सुलझाने वाले बहुतेरे सूत्र, गुरुओं की वाणी। हम पढ़ते हैं, सुनते हैं। वाह-वाह करते हैं, झूम जाते हैं। पर मंत्र नहीं मिलता क्योंकि हम उन्हें अपना नहीं बनाते।और भीऔर भी

लक्ष्मी धन-संपदा लाती हैं। दुर्गा हमें निर्भय बनाती हैं। लेकिन धन-दौलत और सुरक्षा से ही कोई सुखी इंसान नहीं बन जाता है। सुख की तीसरी शर्त पूरी करती हैं संगीत, कला और विद्या की देवी सरस्वती।और भीऔर भी

एक समय की अच्छी बातें आगे जाकर रूढ़ि बन जाती है। मूर्तिभंजक ही मूर्तिपूजक बन जाते हैं। इसलिए जिस तरह सांप अपनी केंचुल उतारता रहता है, उसी तरह हमें भी रूढ़ियों को फेंकते रहना चाहिए।और भीऔर भी