आप कोई भगवान तो हो नहीं कि आपका दिया पाने के लिए पात्रता जरूरी है। आप दिल से देना चाहते हैं तो आप ही को सुनिश्चित करना पड़ेगा कि सामनेवाले को मिला कि नहीं। उस पर तोहमत मढ़ने का कोई तुक नहीं है।और भीऔर भी

ऊंचा उठने की एक सीमा होती है। उसके बाद ठहरकर अगल-बगल बढ़ना होता है। फिर एक से अनेक होकर विस्तार का सिलसिला चलता है। प्रकृति से लेकर विचार व रचना तक यही होता है। समझ लें तो अच्छा है।और भीऔर भी

मां-बाप की छत्रछाया से निकलने के बाद ही बच्चा जीवन के असली सबक सीख पाता है। इसी तरह राम भरोसे रहने पर हम पूरी तरह खुल नहीं पाते। भगवान का सहारा हमारे मानुष जन्म को अधूरा रख छोड़ता है।और भीऔर भी

जिस तरह गाड़ी का पेट्रोल एक मंजिल तक ही पहुंचाता है, वैसे ही भावना किसी लक्ष्य तक पहुंचाने का आधार भर होती है। लक्ष्य पाने के बाद उसकी जगह नई भावना भरनी पड़ती है, तभी जाकर गाड़ी आगे बढ़ती है।और भीऔर भी

अवरुद्ध रंध्रों को खुल जाने दो। बंधे हुए बांधों को टूट जाने दो। ठहरे हुए झरनों को गिर जाने दो। आंधी आने को है। अबाध ऊर्जा का धमाका होने को है। सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। अवाम उठने को है। देश जगने को है।और भीऔर भी

हर कोई अपने में मशगूल है। अपनी भौतिक व मानसिक जरूरतों का सरंजाम जुटा रहा है। आप इसमें मदद कर सकें तो जरूर सुनेगा आपकी। लेकिन खुद नहीं। उसे बताना पड़ेगा कि आप उसके लिए क्या लेकर आए हैं।और भीऔर भी

जैसे ही कोई द्वंद्व सुलझता है, खुशी के नए सोते खुल जाते हैं। प्रकृति का यही नियम है। टकराव को, गुत्थी को नहीं सुलझा पाना ही हार जाना है। और, हारा हुआ शख्स कभी खुश नहीं रहता। खुशी तो जीतने से ही मिलती है।और भीऔर भी

इतने सारे लोग, इतनी सारी शक्तियां और उनके बीच के इतने सारे संबंध। इन्हीं के प्रभाव से चलता है वर्तमान और भविष्य। हम जटिलता के इस सघन जाल को भेद नहीं पाते तो उसे किस्मत या संयोग कह देते हैं।और भीऔर भी

हम सभी मूलतः साधु स्वभाव के हैं। औरों की बातों से अपने काम का ‘सार’ ही ग्रहण करते हैं। लेकिन आलोचना को बिना विचलित हुए सुनना और गुनना जरूरी है क्योंकि अक्सर उनसे नई दृष्टि मिल जाती है।और भीऔर भी

सब कुछ देखने के तरीके पर निर्भर करता है। चाहो तो सारी दुनिया दोस्तों से भरी नजर आएगी। पेड़-पालव तक मदद के लिए हाथ बढ़ाते दिखेंगे। और, चाहो तो घर का आदमी भी बैरी दिखेगा। इसमें से चुनना आपको ही है।और भीऔर भी