झूठ बोलने की सज़ा
औरों से झूठ बोलते-बोलते हम एक दिन अपने से भी झूठ बोलने लगते हैं। वो दिन हमारे लिए सबसे ज्यादा दुखद होता है क्योंकि तब हमारा मूल वजूद ही हमारा साथ हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चला जाता है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
औरों से झूठ बोलते-बोलते हम एक दिन अपने से भी झूठ बोलने लगते हैं। वो दिन हमारे लिए सबसे ज्यादा दुखद होता है क्योंकि तब हमारा मूल वजूद ही हमारा साथ हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चला जाता है।और भीऔर भी
महान लोग कहीं आसमान से नहीं टपकते। वे हमारे-आप जैसे ही लोग होते हैं। दिक्कत यह है कि हम महानता की आभा में खोकर छाया के पीछे भागते रहते हैं। महान बनने के परिणाम को देखते हैं, प्रक्रिया को नहीं।और भीऔर भी
किताबी ज्ञान पिछली पीढ़ियों के अनुभवों का निचोड़ है। लेकिन वह तब तक किसी काम का नहीं, जब तक उसे आज के संदर्भ में पचा न लिया जाए। नहीं तो वह व्यक्ति को वायु के रोगी की तरह असहज बना देता है।और भीऔर भी
हम घरों के कोने-अँतरों में छोटी-बड़ी तमाम चीजों को बचाकर रखने के आदी हो गए हैं। सोचते हैं कि क्या पता, कभी काम आ जाए, जबकि सोचना चाहिए कि क्या इसके बिना हमारा काम चल सकता है।और भीऔर भी
कहा जाता है कि मेहनत से किसी को कुछ भी मिल सकता है। लेकिन सच यह है कि अकेली मेहनत से आप अपने सामाजिक-आर्थिक ऑरबिट या वर्ग की हद तक ही बढ़ सकते हैं। उससे ज्यादा नहीं।और भीऔर भी
समय का अपना चक्र होता है। जो इसे पकड़ नहीं पाते, इसके हिसाब से चल नहीं पाते, वे जीवन की बहुत सारी खुशियों से महरूम रह जाते हैं। देर से सोकर उठनेवाले कभी भी सूर्योदय का आनंद नहीं उठा पाते।और भीऔर भी
जीभ में स्वाद न होता तो क्या हम खाना खाते? सेक्स की सनसनी न होती तो क्या हम बच्चे पैदा करते? हर सृजन, हर बड़े काम के लिए भावना जरूरी है। सीमित सामर्थ्य में ताकत भरने का काम करती है भावना।और भीऔर भी
कोई आपकी तारीफ कर देता है तो कैसे फूल के कुप्पा हो जाते हो आप! फिर कैसे आपकी ऊर्जा बल्ले-बल्ले करने लगती है! यही दूसरों के साथ भी होता है। तारीफ के दो बोल उनका दिन संवार देते हैं, रंगत निखार देते हैं।और भीऔर भी
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