स्त्री होने के नाते ही पत्नी का भाव-संसार पति से भिन्न हो जाता है। हमें इस भिन्नता को अंगीकार करना पड़ेगा। उसका चेहरा हमारे चेहरे में समा नहीं सकता, साथ जुड़कर नया चेहरा बनाता है।और भीऔर भी

निराशा आपको ठहरकर हर नकारात्मक पहलू पर गौर करने का मौका देती है। इसका एक चक्र है। मंजिल के हर पड़ाव पर यह आपको जकड़ देती है ताकि आप और ज्यादा ताकत व विश्वास से आगे बढ़ सकें।और भीऔर भी

जो लोग सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, वे नौकरी करते हैं। जो लोग सिर्फ समाज के बारे में सोचते हैं, वे होलटाइमरी करते हैं। जो लोग अपने साथ-साथ समाज के बारे में भी सोचते हैं, वे उद्यमी बनते हैं।और भीऔर भी

मनोरंजन के इतने साधन, फिर भी सांस्कृतिक शून्य? चैनल पर चैनल सर्फ करते जाने का यह कैसा चटोरापन? ओस प्यास नहीं बुझाती, बाजार कभी शून्य नहीं भरता। इसे तो हमें खुद ही भरना होगा।और भीऔर भी

दुनिया के हर नए-पुराने विचार पर इंसान की छाप है। जिस तरह सुदूर पहाड़ों से धारा के साथ बहता आ रहा पत्थर नीचे पहुंचकर शिव बन जाता है उसी तरह इंसानी विचार भी एक दिन ईश्वरीय बन जाते हैं।और भीऔर भी

कोई हमारा हालचाल पूछ लेता है। सलाम कर देता है। और, हम अपने बारे में भ्रम के शिकार हो जाते हैं। नहीं जानते कि सामने वाला अपनी जरूरत से जोड़कर हमें देखता है। जरूरत खत्म तो मान भी खत्म।और भीऔर भी

हम अलग, तुम अलग। हर जीव अलग, जंतु अलग। पर आकाश वही है, धरती वही है, सारी प्रकृति वही है। अणु वही, परमाणु वही है। फिर, कोई एक नियम भी तो होगा जिससे सारे नियम चलते होंगे!और भीऔर भी

यह अवचेतन में समाए अधूरेपन के बीच पूर्णता की तलाश है जो हम हमेशा नए से नया खोजते रहते हैं। हर नई चीज को देखकर पूछते हैं – इसमें नया क्या है? नए की यह निरंतर तलाश ही हमें ज़िंदा रखती है।और भीऔर भी

ज़िंदगी की तीखी चढ़ाई में हमेशा आस्था की जरूरत पड़ती है जिसके सहारे आप अंदर-बाहर की हर प्रतिकूलता से निपटते हैं। इस आस्था का प्रतीक गुरु, मित्र, देव, पेड़ या आपका कोई प्रिय भी हो सकता है।और भीऔर भी

सही समझ के लिए सत्ता से दो हाथ की दूरी जरूरी है। सत्ता आपकी आंखों पर परदा डाल देती है। ऐसा मतिअंध बना देती है कि आपको बस अपना ही अपना दिखता है, बदलता सच नहीं दिखता।और भीऔर भी