झुंड और समाज
हर जीव सृजन के लिए एकाकीपन और बचाव के लिए झुंड का इस्तेमाल करता है। इंसान भी इससे अलग नहीं है। बस, समाज बन जाने से फर्क यह पड़ा है कि अच्छी टीम इंसान के सृजन को निखार देती है।और भीऔर भी
अच्छा और अपना
चीजें पहले अच्छी लगती हैं। फिर अपनी लगती हैं। फिर, अपनी बनती हैं। पर, अच्छा लगने और अपना बनने तक का सफर सीधा-सरल नहीं होता। यह बात विचारों से लेकर लोगों तक पर लागू होती है।और भीऔर भी
सृजन और संघर्ष
इंसान की सृजनात्मकता निठल्ले चिंतन की उपज नहीं होती। संघर्ष-विहीन जीवन से सृजन नहीं, उबासियां निकलती हैं। कठोर वास्तविकता की रगड़-धगड़ से ही सृजन की चिनगारी फूटती है।और भीऔर भी
अंदर का कृष्ण
हर पल महाभारत छिड़ी है। मोह में फंसकर अर्जुन अकर्मण्य हो जाता है। अंदर का कृष्ण ज्ञान न कराए तो हम हथियार डालकर बैठ जाते हैं। लेकिन लड़े बिना न यह धरती मिलती है और न ही वीरगति।और भीऔर भी
आप मर चुके हैं!
अगर हर दिन आपके भीतर कोई नया विचार नहीं कौंधता, गुत्थियों से भरे इस संसार में किसी गुत्थी को सुलझाने का हल्का-सा सिरा भी नहीं मिलता तो समझ लीजिए कि आप जीते जी मर चुके हैं।और भीऔर भी
कहां का अगला जन्म!
न सीखने की कोई उम्र होती है और न ही गलतियों को दुरुस्त करने के लिए अगले जन्म की जरूरत होती है। जो कहते हैं कि अगले जन्म ये गलती नहीं करेंगे, वे बस अपनी चमड़ी बचा रहे होते हैं।और भीऔर भी
समय और खरहा
समय हर जड़त्व से मुक्त कछुआ है। लेकिन हम जड़त्व से ऐसे घिरे हैं कि यथास्थिति नया कुछ करने से रोकती है। सोते-जागते खरगोश की तरह बढ़ते हैं हम। ठान लें तो समय से आगे निकल जाएं।और भीऔर भी
शरीर है पहले
शिव है तो शक्ति है। धरती है तो गुरुत्वाकर्षण है। शरीर है तो मन है। मन को निर्मल रखना है तो पहले शरीर को सहज व शुद्ध रखना जरूरी है। बाद में मन भी शरीर को साधने में मदद करता है।और भीऔर भी
भविष्य ऊटपटांग
हर कोई भविष्य जानता चाहता है, उसकी झलक पाना चाहता है। लेकिन जब हम समय के साथ वाकई वहां पहुंच जाते हैं, तब पता चलता है कि हम उसके बारे में कितना ऊटपटांग सोचते थे।और भीऔर भी
