मैंने कुछ काम वर्ड को, कुछ एक्सेल को दे दिया। कुछ मोबाइल और लैपटॉप को बांट दिया। बाकी जो भी काम यंत्र कर सकते हैं, सभी को धीरे-धीरे बांट दूंगा। फिर मैं फुरसत से घूम-घूमकर दोस्त बनाऊंगा।और भीऔर भी

खिड़की-दरवाजे सारे बंद। फिर भी छिपे से छिपे कोने तक में धूल आ ही जाती है। धूल न भी दिखे तो लाखों जीवाणु घर किए रहते हैं। इसलिए हर दिन सफाई जरूरी है। हर दिन मनन जरूरी है, अध्ययन जरूरी है।और भीऔर भी

प्रकृति हर पल नाना रूपों में अपने ऐसे तमाम रहस्य हमें बताती रहती है जो हमारे खुश रहने के लिए जरूरी हैं। लेकिन हम हैं कि अपने में ही डूबे रहते हैं। बाहर देखते नहीं तो अंदर के कपाट बंद पड़े रहते हैं।और भीऔर भी

जब आप खुद को कर्ता नहीं, निमित्त मानते हैं तो और कुछ हो या न हो, तमाम झंझट व तनाव से बच जाते हैं। आपके अंदर एक तरह की तटस्थता आ जाती है और आप अपना काम ज्यादा शिद्दत से कर पाते हैं।और भीऔर भी

कितने सारे भ्रम हम पाले रहते हैं! औरों के बारे में भ्रम, अपने बारे में भ्रम। नेताओं के बारे में भ्रम, पक्ष के बारे में भ्रम, विपक्ष के बारे में भ्रम। भ्रमों का जाल। संशयात्मा न बनें। पर अविश्वास करना तो सीखें।  और भीऔर भी

आपके मानने या चाह लेने से कुछ नहीं होगा। हाय-तौबा मचाना निरर्थक है। पहले जो है, जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार कीजिए। अगली यात्रा वहीं से शुरू होगी। सीमाएं समझकर ही सीमाएं तोड़ी जाती हैं।और भीऔर भी

मां-बाप की उंगली, घर की छांह, कभी नौकरी का साया और फिर भगवान का आसरा। इन बैसाखियों से कभी तो तौबा कीजिए। कभी तो एकदम अनाथ होकर देखिए कि आपका अपना शक्ति-पुंज क्या है!और भीऔर भी

जान भर लेना अपने-आप में पर्याप्त नहीं। लेकिन जानना वह कड़ी है जिससे कर्म की पूरी श्रृंखला खुलती चली जाती है। सच का ज्ञान हमें इतना बेचैन कर देता है कि हम चाहकर भी शांत नहीं बैठ सकते।और भीऔर भी

कोई काम अनंत समय तक नहीं टाला जा सकता। शुरुआत कभी तो करनी ही होगी क्योंकि आदर्श हालात कभी नहीं बनते, शुभ घड़ी कभी नहीं आती। जब भी शुरू कर दें, घड़ी टिक-टिकाने लगेगी।और भीऔर भी

किसी मूर्ख को आसानी से खुश किया जा सकता है। बुद्धिमान को खुश करना और भी आसान है। लेकिन अपने ‘ज्ञान’ पर मुग्ध लोगों को ब्रह्मा भी खुश नहीं कर सकते। इसलिए इनके मुंह नहीं लगना चाहिए।और भीऔर भी