स्वांतः सुखाय कुछ नहीं। तुम दूसरों के लिए काम करो। दूसरे तुम्हारा ख्याल रख लेंगे। लेकिन तभी, जब दूसरों को समझ में जाएगा कि आप उनके लिए जो काम कर रहे हैं, वो वाकई उनके काम का है।और भीऔर भी

कोंपल फूटती है तो बड़ी ही बेचैन होती है। फौरन उसे किसी तलब की, तसल्ली की जरूरत होती है। खटाखट बढ़ने व खिलने के दौर में हमारे साथ भी यही होता है। संभले नहीं तो नशा हमें धर दबोचता है।और भीऔर भी

आप सौभाग्यशाली हैं जो असंतुलन से संतुलन तक पहुंचने का माध्यम बन रहे हैं। बड़ी किस्मत वाले हैं जो नवसृजन के काबिल समझे गए। लेकिन बीड़ा उठाने से पहले से जान लें कि यह राह भयंकर पीड़ादायी है।और भीऔर भी

नजर खराब हो तो कुछ साफ नहीं दिखता। नजरिया गलत हो तो घर से लेकर बाहर, छोटी से लेकर बड़ी चीज तक के बारे में इंसान गलत धारणाओं का शिकार रहता है। एक जगह सही तो सब जगह सही।और भीऔर भी

जब औरों की आशाएं आपसे जुड़ जाती हैं तो जीत या हार सिर्फ आपकी नहीं होती। वह अपने-पराए उन तमाम सामान्य जनों की होती है जो खुद लड़ नहीं सकते लेकिन आपके साथ मर जरूर सकते हैं।और भीऔर भी

जब तक सब कुछ हासिल है, हम खुद को भगवान का राजकुमार माने बैठे रहते हैं। भूल जाते हैं कि यहां कुछ भी अपने-आप नहीं मिलता। हमें जो भी मिला है, वह हमारे अग्रजों-पूर्वजों के कर्मों का फल है।और भीऔर भी

आदतों के बिना ज़िंदगी नहीं चलती। एकदम रसहीन बन जाती है। इसलिए आदतें तो डालनी ही पड़ती हैं। अब यह आप पर है कि आप खुद को अच्छी आदतों का गुलाम बनाते हैं या बुरी आदतों का।और भीऔर भी

हम काम हर कोई नहीं कर सकता। इसलिए हमें काम वही करना चाहिए जो हम सबसे अच्छा कर सकते हैं। बाकी औरों के लिए छोड़ दें। लेकिन आज ये छूट कहां! आज तो हम पैसे के लिए ही काम करते हैं।और भीऔर भी

भाषा हमें अपनी संवेदनाओं को सही तरीके से सजाने-संजोने की क्षमता देती है। भाषा न होती तो कोणार्क के सूर्य मंदिर की परिकल्पना नहीं हो सकती थी और न ही मोनालिसा का अवतरण हुआ होता।और भीऔर भी

कोई इंसान सुखी हो, इसका मतलब कतई यह नहीं कि वह खुश भी हो। खुशी तो एक अनुभूति है जिसका पारा ऊपर-नीचे होता रहता है। खुश रहना एक कला है, जिसकी आदत बड़े जतन से डालनी पड़ती है।और भीऔर भी