क्षैतिज या लंबवत
बढ़ने के दो ही तरीके हैं क्षैतिज या लंबवत। दूब जमीन को पकड़ क्षैतिज रूप से फैलती जाती है। वहीं पेड़ बढ़ने के लिए जमीन में लंबवत धंसता चला जाता है। दूब अपने लिए जीती है। पेड़ सबके काम आते हैं।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
बढ़ने के दो ही तरीके हैं क्षैतिज या लंबवत। दूब जमीन को पकड़ क्षैतिज रूप से फैलती जाती है। वहीं पेड़ बढ़ने के लिए जमीन में लंबवत धंसता चला जाता है। दूब अपने लिए जीती है। पेड़ सबके काम आते हैं।और भीऔर भी
जो लोग सुधारों की हर गुंजाइश को परखते हुए बढ़ते हैं, वे एक दिन व्यापक क्रांति के संवाहक बन सकते हैं। लेकिन जो लोग सीधे क्रांति को लपकना चाहते हैं, वे अंततः जनता से कटकर अवसरवादी बन जाते हैं।और भीऔर भी
हर किसी को दूसरे की नहीं, दूसरों की पड़ी है। दूसरे के लिए काम करने से क्या मिलेगा? पर दूसरों को लुभा लिया तो धंधा जम जाएगा। दूसरों को साधने में दूसरे के गायब हो जाने का यह रहस्य वाकई गजब है।और भीऔर भी
भारत अगर ऋषियों-मुनियों का देश रहा है तो एकबारगी यह उनसे रीता नहीं हो सकता। दिक्कत यह है कि हम भागकर अतीत की वादियों में यूं गुम हो जाते हैं कि वर्तमान को ठीक से देख ही नहीं पाते।और भीऔर भी
ऑक्सीजन है, तभी तक जीवन है। इसके बिना शरीर बेजान हो जाता है। इसी तरह जानकारी लोकतंत्र का ऑक्सीजन है। इसके बिना वो भीड़तंत्र है, जिसे कोई भी भावनाओं को भड़का कर हांक सकता है।और भीऔर भी
जब कुछ भी साफ समझ में न आए तो खुद को संयोगों के भरोसे छोड़ देना चाहिए। वैसे भी हमारी जिंदगी में सच कहें तो 20% ही योजना और 80% संयोग काम करते हैं। इसे मान लेने में क्या हर्ज है?और भीऔर भी
आदर्श हालात या आदर्श अवसर जैसी कोई चीज व्यवहार में नहीं होती। जो इसकी बाट जोहते हैं, वे मंजिल तक पहुंचना तो दूर, चल ही नहीं पाते। इसलिए थोड़ा कम की आदत डाल लेना ही सही है।और भीऔर भी
हर विचारधारा की उम्र होती है। किसी की कम तो किसी की थोड़ी ज्यादा। इसके बाद स्वार्थों के पैमाने में कसकर वे अपना सारतत्व खो देती हैं। इसीलिए पुरानी को तोड़ नई विचारधाराएं आती रहती हैं।और भीऔर भी
छुटपन में मां, फिर बाप और फिर शरीर ही हमारा खेवैया होता है। इसे शराब के क्षार, धूम्रपान व तंबाकू की घुटन और भोजन की अशुद्धता से अस्थिर रखेंगे तो वह सहजता से कैसे हमारा ख्याल रख पाएगा!और भीऔर भी
जब हम किसी के काम की तारीफ करते हैं तो परोक्ष रूप से उसे जिम्मेदार बनाते हैं। उसे लगता है कि एक गलत कदम भी दूसरों का भरोसा तोड़ सकता है। इसलिए वह बराबर सतर्क व सावधान रहता है।और भीऔर भी
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