समय तो यंत्रवत चलता है। हमने ही उसे नैनो सेकंड से लेकर साल तक के पैमाने में कसा है। अपने जीवन को हम जन्मदिन के चक्र में कसते हैं। लेकिन यह हमारा अपना चक्र है। समय से हमारी कोई होड़ नहीं।और भीऔर भी

अगर हम जानते हैं कि हमें कहां जाना है और हम यह भी जानते हैं कि वहां पहुंचने के लिए क्या करना जरूरी है तो समझ लीजिए कि यात्रा शुरू हो गई और आधी मंजिल मिल गई। अब बस पहुंचना ही बाकी है।और भीऔर भी

हमारी खुशी का मूल स्रोत प्रकृति है। समाज तो बस बिचौलिया है जो बनने-बनते हजारों साल में बना है। इस बात को समझकर हम मूल प्रकृति के जितना करीब जाएंगे, हमारी खुशी उतनी बढ़ती जाएगी।और भीऔर भी

भावनाएं माहौल बनाती हैं। विचार ताकत देते हैं। हमारा कर्म उसे संगत निष्कर्ष तक पहुंचाता है। भावना से लेकर विचार तक कर्म की सेवा के लिए हैं। कर्म सर्वोच्च है। इस तथ्य को मान लेने में हर्ज ही क्या है!और भीऔर भी

कभी किसी से इतना प्यार न करो कि उसके बिना ज़िंदगी सूनी हो जाए। कभी किसी पर इस कदर भरोसा न करो कि उसके टूटने पर किसी और पर भरोसा ही न जमे। जीने के लिए ऐसा निर्लिप्त भाव जरूरी है।और भीऔर भी

जीते तो सभी अपने लिए ही हैं। कुछ का जीना दूसरों का भला करता है। ज्यादातर का जीना दूसरों का नुकसान नहीं करता। लेकिन कुछ हैं जो दूसरों का गला काटकर ही फलते-फूलते हैं। इनका सर्वनाश जरूरी है।और भीऔर भी

जितना हम जानते जाते हैं, सुख का स्तर उतना ही उन्नत होता जाता है और दुख का दायरा उतना ही बढ़ता जाता है। उलझाव बढ़ने से दुख बढ़ता है और उन्हें सुलझाते जाओ तो सुख बढ़ता चला जाता है।और भीऔर भी

हर किसी के लिए सब कुछ जानना संभव नहीं। लेकिन इतना तो पता होना चाहिए कि क्या है जो हम नहीं जान सकते। तभी तो हम उस हद तक सारा कुछ जानने का जेहाद मरते दम तक जारी रख सकते हैं।और भीऔर भी

हम सभी भीतर चुम्बक लिए घूमते हैं। एकतरफा हाथ बढ़ाकर हमें किसी से जुड़ने की नहीं, बल्कि आपस की इस चुम्बकीय शक्ति को समझने की जरूरत है। एक चुम्बक दूसरे चुम्बक को खींचता ही है।और भीऔर भी

करते हम हैं और नाम दूसरों का लगा लेते हैं। इससे हम तो कमजोर के कमजोर रह जाते हैं और दूसरा भगवान और भगवान, सर्व-शक्तिमान बन जाता है। अन्यथा उनकी औकात कंकड़ से ज्यादा नहीं।और भीऔर भी