हमें हर चीज का मूल्य दूसरों की नज़र से आंकना चाहिए। कोई चीज हो सकता है कि हमें मूल्यवान न लगे, लेकिन दूसरों के लिए वह बहुमूल्य हो सकती है। या, हमें मूल्यवान लगे और दूसरों को फालतू।और भीऔर भी

घर-परिवार से लेकर काम-धंधे तक स्वार्थों की दुनिया फैली है। इनमें कुछ गिने-चुने लोग ही होते हैं जो आपकी परवाह करते हैं। ऐसे हमदर्द दोस्त बड़े नसीब वालों को ही मिलते हैं। इसलिए इनकी कद्र जरूरी है।और भीऔर भी

निष्काम भाव से कर्म दो ही तरह के लोग कर सकते हैं। एक, जिनका वर्तमान व भविष्य दोनों सुरक्षित हो और दो, जिनका वर्तमान व भविष्य इतना असुरक्षित हो कि उनके पास कोई चारा ही न बचा हो।और भीऔर भी

सफल होते ही लोग आपके दीवाने हो जाते हैं। पर, कोई यह नहीं देखता कि किन-किन हालात व संघर्षों से होड़ लेते हुए आप वहां पहुंचे हैं। कितना अजीब है कि शीर्ष पर पहुंचते ही आप निपट अकेले हो जाते हो।और भीऔर भी

जब वर्तमान बेकार और भविष्य अनिश्चित हो, तभी कोई अतीतजीवी बनता है। वरना, किसी को इतनी फुरसत कहां कि गुजरे कल को महिमामंडित करता फिरे! अतीतजीविता मर्ज का लक्षण है, निदान नहीं।और भीऔर भी

बेधड़क निडर होकर जीनेवाले लोग ही महान बनते हैं। अगर हम देश में निडर होकर जीने का माहौल नहीं दे सकते तो भारत महान कभी नहीं बन सकता है और यहां बौनों की ही फौज पैदा होती रहेगी।और भीऔर भी

देश यकीनन वहां रहनेवालों से बनता है। लेकिन उसे रहने लायक बनाती हैं स्थानीय से लेकर राज्य व राष्ट्रीय सरकारें। अगर हर तरफ गंदगी, कदाचार व भ्रष्टाचार है तो पूरा सरकारी तंत्र ही देशद्रोही है।और भीऔर भी

कर्ता बाहर का नहीं, अंदर का ही कोई जीव-अजीव है। संतुलन हासिल करने के क्रम में सचेत-अचेत कर्म ही हर घटना के कारक हैं। बाकी सब समझने की सुविधा के लिए हम जैसे इंसानों द्वारा गढ़े गए पुतले हैं।और भीऔर भी

जीवन संविधान से मिला मूल अधिकार है। पर जब हमारे होने, न होने से किसी को कोई फर्क न पड़े तो हम जीते हुए भी मर जाते हैं। अगर आज करोड़ों लोग अप्रासंगिक हैं तो यह तंत्र ही संविधान-विरोधी है।और भीऔर भी

इस जहां में सिर्फ एक चीज है जिस पर इंसान का वश नहीं है। वो है समय और उसी से संचालित होता जीवन-मरण का चक्र। बाकी किसी भी चीज की काट नियमों को समझकर निकाली जा सकती है।और भीऔर भी