जब किसी सेवा या उद्योग का मूल मकसद मुनाफे को महत्तम करना हो जाए तो उससे इंसानी सरोकारों के कद्र की उम्मीद बेमानी है। मुनाफे की यह दौड़ भिखारी तक की जेब से दमड़ी निकाल लेती है तो बाकियों का लुटना एकदम स्वाभाविक है।और भीऔर भी

हर ज़माने में धन और शोहरत कमाने के रास्ते अलग होते हैं। जो इन रास्तों को छोड़कर चलते हैं, उन्हें शुरुआत में बहुत ही कठिन-कठोर परेशानी झेलनी पड़ती है। लेकिन अंततः कामयाब हो गए तो उनकी राह नए ज़माने की राह बन जाती है।और भीऔर भी

eye of the butterfly

यही कोई दोपहर बाद की बेला थी। तितली रानी दो घंटे से कमरे में फंसी हुई थी। लंबी-लंबी कांच की खिड़कियों से उसे रोशनी नजर आती तो बाहर निकलने के लिए वहीं से भागने की कोशिश करती। उसमें नरम, मुलायम, नाजुक पंख पारदर्शी कांच से टकराते और वो नहीं निकल पाती। पूरी मेहनत करती। पंख पूरे ज़ोर से चलाती। लेकिन हर बार वही हश्र क्योंकि जिसे वह खुला द्वार समझ रही थी, बाहर छिटकी हरियाली तक पहुंचनेऔरऔर भी

अलौकिक नहीं, लौकिक शक्तियां ही हमें बुरे वक्त से उबारती है। कुछ को हम देख लेते हैं, ज्यादातर को नहीं। यहां तक कि साथ देनेवाले तक को भी अलौकिक शक्तियों का दूत मानते हैं। धंधेबाज़ इसका फायदा उठाकर अपना वक्त चमका लेते हैं।और भीऔर भी

आफतों को मानसून की तरह मौसम विभाग की भविष्यवाणी की कद्र नहीं। पता नहीं कि कब सिर उठाए चली आएं। आफतें मुंबई की बारिस भी नहीं कि आई और गायब। वे बरसती हैं ऐसी मूसलाधार कि तांता टूटता ही नहीं। लेकिन टूटेंगे हम भी नहीं।और भीऔर भी

व्यक्तियों के मिलने से समुदाय या सम्प्रदाय बनते हैं, जबकि राष्ट्र का निर्माण संस्थाओं के बिना नहीं हो सकता है। समुदाय या सम्प्रदाय तात्कालिक हितों पर आधारित होते हैं, जबकि संस्थाओं के पीछे दीर्घकालिक हित काम करते हैं।और भीऔर भी

जिस तरह कोयल के अंडे को कौआ अपना समझकर सेता रहता है। उसी तरह हम दूसरों की चिंताओं को अपने सिर ओढ़ लेते हैं। सरकार से लेकर प्रभुवर्ग अपनी चिंताओं को सबकी चिंताएं बनाकर पेश कर देते हैं और हम भी मर्सिया गाने लगते हैं।और भीऔर भी

अच्छी बातें किसी गाड़ी के विज्ञापित माइलेज की तरह होती हैं जो आदर्श स्थितियों में ही लागू होती हैं। उन्हें अपनी हकीकत से न मिलाया जाए तो वे महज बातें ही रह जाती हैं। इसलिए ज़िंदगी में पढ़ने व सुनने से ज्यादा गुनना जरूरी है।और भीऔर भी

अपने तक सीमित। खूंटे से बंधी ज़िंदगी। परोक्ष रूप से तंतुओं के तंतु भले ही ग्लोबल हो गए हों, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से रिश्ते बहुत सिकुड़ गए हैं। ऐसे में हांकनेवालों की मौज है क्योंकि किसी को सिर उठाकर उनकी तरफ झांकने की फुरसत ही नहीं है।और भीऔर भी