सनफार्मा के नतीजों पर रैनबैक्सी के विलय का बोझ पड़ना ही था तो नतीजों में कमज़ोरी स्वाभाविक थी। ऐसे में ट्रेडरों व निवेशकों में दो तरह की सोच चली। एक, कंपनी दो-तीन तिमाहियों बाद तेज़ी से बढ़ेगी। दूसरी यह कि विलय उस पर भारी पड़ेगा। दूसरी सोच बाज़ार में हावी हो गई तो उसका शेयर छह सालों की सबसे ज्यादा गिरावट का शिकार हो गया। यहीं पर स्टॉप-लॉस का अनुशासन काम आता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बहुत ही कम होता है कि विदेशी और देशी संस्थाएं एक ही दिशा में सौदे करें। अमूमन विदेशी बेचते हैं तो देशी खरीदते हैं और विदेशी खरीदते हैं तो देशी बेचते हैं। दोनों महारथी! फिर आखिर सही कौन? यकीनन बाज़ार की दिशा विदेशी संस्थाएं तय करती हैं। लेकिन गिरने पर खरीद और उठने पर बिक्री से मुनाफा कमाने का काम देशी संस्थाएं करती हैं, खासकर एलआईसी। म्यूचुअल फंड तो फिसड्डी हैं। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

स्मॉल-कैप कंपनियों के शेयर जमकर उछलते हैं तो गिरते भी हैं उतनी ही तेज़ी से। वहीं, मिड-कैप कंपनियों के साथ भी कमोबेश यही होता है। लेकिन मजबूत लार्ज-कैप कंपनियां अगर सही भाव पर पकड़ ली जाएं तो उनमें धीमी ही सही, मगर निरतंर वृद्धि होती रहती है। आज तथास्तु में ऐसी ही एक लार्ज-कैप कंपनी जिसके शेयर बीते तीन महीनों में 21% गिर चुके हैं। अभी इसमें निवेश करना लंबे समय में काफी लाभकारी साबित होगा।…और भीऔर भी

जब आप वित्तीय बाज़ार में उतरते हैं तो कल्पना कीजिए कि आप किन शक्तियों के बीच खुद को डाल रहे हैं। लाखों लोग देश के, विदेश के। बैंकों के, पेंशन फंडों, म्यूचुअल फंडों व बीमा कंपनियों के, ब्रोकरेज़ हाउसों के। ऊपर से बहुत सारे प्रोफेशनल ट्रेडर/निवेशक जिनकी आजीविका इसी से चलती है। इन सबके बीच व्यक्तियों के नहीं, बल्कि सामूहिक विवेक से तय होता है किसी सूचकांक या स्टॉक का स्तर। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडर के तनाव से बचने का एक रास्ता यह है कि वो इंट्रा-डे ट्रेडिंग छोड़ दे। इससे बार-बार उसे बाज़ार और स्टॉक के भावों को देखने की ज़रूरत नहीं होगी। इसलिए उसे स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड का ही सहारा लेना चाहिए। साथ ही बार-बार कंप्यूटर या मोबाइल पर भाव देखने की आदत छोड़ देनी चाहिए। तनाव से बचने का दूसरा तरीका यह है कि स्टॉप-लॉस लगाकर दिन में सुबह-शाम ही भाव देखें। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी