आम तौर पर बाज़ार में खरीदने व बेचने के दो तरह के सिग्नल रहते हैं। पहला सिग्नल खुद बाज़ार देता है जो मांग व सप्लाई की स्थिति पर आधारित है और भावों व उनके चार्ट पर झलकता है। दूसरे सिग्नल में ब्रोकरेज़ व एनालिस्टों की रिपोर्ट, सकारात्मक, नकारात्मक खबरें, डाउनग्रेड व अपग्रेड जैसी बाकी सारी चीजें शामिल हैं। एक सिग्नल आपको सच्चाई से रूबरू कराता है, जबकि दूसरा सिग्नल शुद्ध बकवास होता है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाजार में एक ही समय खरीदने और बेचने के भांति-भांति के सिग्नल चलते हैं। ये खबरों से लेकर टेक्निकल संकेतकों, कंपनी की घोषणाओं, ब्रोकरेज हाउसों के अपग्रेड या डाउनग्रेड जैसे अनेक रूप में होते हैं। इन सिग्नलों का मतलब दुनिया भर में लाखों ट्रेडर व निवेशक अपने मन में बैठी मान्यताओं व धारणाओं के हिसाब से निकालते हैं। लेकिन अहम बात यह है कि इनमें से कौन-सा मतलब बराबर कमाई कराता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

मनोविज्ञान अपने-आप में विज्ञान की एक शाखा है। मगर, ट्रेडिंग के मनोविज्ञान पर बहुत सारी किताबें लिखी गई है। इन किताबों को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे कोई डॉक्टर पेट के एंजाइम वगैरह के अध्ययन के बाद कहे कि आपको भूख लगी। वहीं, आप तो बगैर कोई ऐसा अध्ययन या विश्लेषण किए ही बता सकते हैं कि आपको भूख लगी है। ट्रेडिंग करते वक्त हमें अपने मनोविज्ञान को ऐसा ही सहज बनाना होगा। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

सागर उफान पर होता है तो नदियां ही नहीं, नाले भी उफनते लगते हैं। गधे और खच्चर भी तैरते लगते हैं। अपने शेयर बाज़ार का फिलहाल यही हाल है। ज्यादातर अच्छे शेयर कुलांचे मारते जा रहे हैं। बेकार कंपनियों के शेयर भी फालतू चमकने लग गए हैं। ऐसे में सुरक्षित निवेश लायक शेयरों को खोज निकालना भूसे के ढेर में सुई खोजने जैसा काम हो गया है। फिर भी पेश है तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

आपने अभी तक गौर नहीं किया हो तो अब गौर कर लें। कभी-कभी ढाई बजे के आसपास शेयर बाज़ार का रुख खटाक से बदल जाता है। सीमित रेंज में चलता निफ्टी एकबारगी उछल या फिसल जाता है। यह बाज़ार में बनावटी मांग/सप्लाई डालने का नतीजा है। इसे जानकार लोग फैंटम प्रभाव कहते हैं। इसमें प्रोफेशनल ट्रेडर या एलआईसी जैसे बड़े संस्थान चुनिंदा सौदों से चंद मिनटों में बाज़ार का रुख बदल देते हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी