अमेरिका की राह चलता हमारा बाजार
आज की ग्लोबल दुनिया में और कुछ हो या न हो, लेकिन वित्तीय बाज़ार सचमुच ग्लोबल हो गए हैं। ताजा अध्ययन से पता चला है कि अमेरिका के डाउ जोन्स सूचकांक और हमारे सेंसेक्स के बीच का को-रिलेशन पिछले 20 सालों में 0.89 से लेकर 0.94 तक रहा है। इतना गहरा रिश्ता अच्छा नहीं होता। इसके +1 होने का मतलब एकदम एक जैसा बर्ताव होता है, जबकि -1 एकदम विपरीत बर्ताव दिखाता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी
बाज़ार गिरा ज़रूर, पर काफी नहीं
उठना-गिरना शेयर बाज़ार का स्वभाव है। अहम बात है सही वक्त पर निवेश करना क्योंकि यही दिलाता है बाज़ार का भरपूर फायदा। बाज़ार इधर गिरा है। तमाम शेयर भी गिरे हैं। लेकिन यह गिरावट भी सही वक्त पर किए गए निवेश की बराबरी नहीं कर सकती। आज हम जो कंपनी उठा रहे हैं, उसमें अगर किसी ने पहले बताए हमारे वक्त पर निवेश किया होगा तो उसका धन 22 महीने में लगभग तीन गुना हो चुका होगा…औरऔर भी
शेयर बाज़ार का बुलबुला लगा फटने!
अमेरिका में अकेले जनवरी महीने में दो लाख नई नौकरियां जुड़ना और उसके चलते ब्याज दर बढ़ाए जाने के भरोसे से डाउ जोन्स सूचकांक का लुढ़क जाना या अपने यहां लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स का लगना। बजट के बाद अपने शेयर बाज़ार के गिरने की दोनों ही वजहें मानी जा रही हैं। यह भी कहा जा रहा है कि शेयरों में बनते बुलबुले को तोड़ने के लिए सरकार ने यह टैक्स लगाया। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी
विकास घटने, महंगी बढ़ने का अंदेशा
रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2017-18 की छठी व आखिरी दोमाही मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दरों को जस का तस रखा है। लेकिन आर्थिक विकास दर का अनुमान 6.7% से घटाकर 6.6% कर दिया और माना है कि अगले वित्त वर्ष 2018-19 की पहली छमाही में रिटेल मुद्रास्फीति की दर 5.6% तक जा सकती है। बॉन्ड बाज़ार ने इसे शांति से लिया है और सरकारी बॉन्डों पर यील्ड कमोबेश अपरिवर्तित रही। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी







