सस्ता धन मुश्किल, वहीं रिटर्न ज्यादा
अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल सिस्टम से 42,000 करोड़ डॉलर खींचने जा रहा है, जबकि अगले साल 60,000 करोड़ डॉलर निकालने की योजना है। सिस्टम से धन निकालने से वहां ब्याज़ दरें बढ़ने लगी हैं। दस साल के अमेरिकी ट्रेजरी बांडों पर यील्ड की दर 2.95% हो चुकी है। जाहिर है कि जब विदेशी निवेशकों को सस्ता धन मिलना मुश्किल और अमेरिका में ही ज्यादा रिटर्न मिलने लगेगा, तो वे भारत क्यों आएंगे! अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी
मौका ताड़ निकल रहे विदेशी निवेशक
विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से 5 फरवरी से कल, 21 फरवरी तक 14,069.78 करोड़ रुपए निकाल चुके हैं। यह उनकी मजबूरी है। दरअसल, 2008 के वित्तीय संकट के बाद अमेरिका समेत दुनिया के तमाम केंद्रीय बैंकों ने बांडों के जरिए सिस्टम में भारी भरकम रकम डाली। 2009 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैलेंसशीट 50,000 करोड़ डॉलर थी जो अब 4.2 लाख करोड़ डॉलर की हो गई है। वो इसे घटा रहा है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी
मुनाफा समेटने का सिलसिला है जारी
कोई भी संस्था या अमीर शेयर बाज़ार में हमेशा के लिए निवेश नहीं करते। उनका मकसद है लाभ कमाना। इस बार बजट के बाद यही सिलसिला जारी है। वे रुक-रुककर मुनाफावसूली कर रहे हैं। पहले सेंसेक्स और निफ्टी ही गिर रहे थे। लेकिन अब मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों के शेयरों में भी बिकवाली शुरू हो गई है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के साथ ही अब देशी संस्थाएं भी खरीदने से ज्यादा बेचने लगी हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी
अमीरों व संस्थाओं के हाथ में बागडोर
जिन 1% सुपररिच या एचएनआई भारतीयों ने 2017 में 73% दौलत हासिल की, वे शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों के जरिए या सीधे निवेश करते हैं। बाज़ार में एलआईसी जैसी संस्थाएं भी जमकर पैसा लगाती हैं। उसने दिसंबर 2017 की तिमाही तक जिन 327 लिस्टेड कंपनियों में 1% से ज्यादा शेयर खरीद रखे हैं, उनमें उसका निवेश 6.26 लाख करोड़ रुपए है। ऐसी संस्थाएं और एचएनआई ही बाज़ार का रुख तय करते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी






